Tuesday, 5 July 2016

जिम्मेदार जनता या नेता? यूपी का रुकता विकास

 मायावती लूटी मुलायम लूटे औ लूटे लिए शिवपाल।

बचा खुचा आजम ने लूटा, भैया अबही राम गोपाल।।

यदि किसी की बातों का बुरा लगे तो, सबसे पहले ये देखें कि व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है या नहीं, यदि व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है तो उस बात को भूल जाएं, फिर देखें कि बात महत्त्वपूर्ण है की नहीं, यदि बात महत्त्वपूर्ण है तो व्यक्ति को भूल जाएं, हो सकता है न व्यक्ति और न बात महत्त्वपूर्ण हो तो व्यक्ति की कुत्तागिरी देखें फिर भी लात मारकर भगाएं नहीं क्योंकि बंद घड़ी भी दिन में दो बार सही समय बताती है, इस दुनियाँ में कुछ भी बेकार नहीं। गंदे नाले का पानी अगर पी नहीं सकते तो कम से कम आग बुझाने के काम तो आ सकता है। मगर सभी वस्तुओं को अपनाया भी नहीं जा सकता। यही अपनाने की प्रक्रिया ही हमें बनाती है, सफल-असफल, आमिर-गरीब, राजा-प्रजा, मुर्ख-विद्वान आदि। जो लोग अत्यधिक भावुक होते है वे सबसे पहले रिस्ते, दोस्त अतिशीघ्र बनाते है, और उनके अंदर बातों का प्रभाव भी अधिक आसानी से होता है। इसिलए भाषण मात्र से उन्हें दुनियां बेवकूफ़ बना जाती है। ऐसे लोग बड़े खयाली होते है, सामने वाले ने कोई वादा भी नहीं किया मगर अपने मन में तरह तरह के ख़याल बैठा लेते है। जैसे मायावती ने नारा लगाया "तिलक तराजू औ तलवार, इनको मारो जूते चार।" तो दलितों में ख़याल लगाया कि हमरा नेता जीतेगा तो सभी सवर्णो को खदेड़ कर सारी ज़मीन हमें दे देगा। मगर हुआ कुछ उल्टा ही। मायावती ने पैसे लेकर पार्टी के टिकट बेचे उन्ही सवर्णो को, जिसकी संपत्ति छिनने का ख़्वाब लिए बैठा था लालची मानव, और खुद कमाये अरबों खरबों। "अपने तो हो गई दौलत की बेटी, दलित ढूढ़ रहा है दो वक्त की रोटी।" बड़े बड़े पार्क हाथी घोड़ो के ताबूत बनवाये, साथ ही खुद जिन्दा मगर अपनी मूर्तियां लगवाये। ताज़महल के पत्थर बेचे, NRHM में ग़रीबो की दवाइयां बिक गई। एक, एक सांसद, विधायक अरबों खरबों रुपये कमाए, मगर दलित के हाथ पहले भी झंडू थे और अब भी झंडू ही नजर आये।

थक हार कर दलितों का कुछ उमंग बगैर मेहनत संपत्ति पाने वाला ख़याल, कुछ कम हुआ ही नहीं था, कि कथित पिछड़ा वर्ग जो कभी राज घराने से आता है, कहने के लिए भगवान कृष्ण का वंशज कहलाता है, मगर हराम की संपत्ति लेने का ऐसा चस्का चढ़ा कि, यूपी का कमान विरादरी के नाम पर पकड़ा दिया मायाबी मुलायम को। जिसके एक, एक भाई, भतीजे नात रिस्तेदार यार दोस्त सबने लूटा यूपी को , जिनके घर में कभी मेहनत से दो वक्त के चूल्हे जला करते थे, आज वे शराब शबाब कबाब के शौक़ीन हो गए। कहते है, जो चीज आसानी से मिलती है, वह आसानी से जाती भी है। कुछ अन्य जातियों को भी खूब लाभ मिला, क्योंकि ये दुनियां व्यापर है। राजा कोई भी हो चाहे आप खुद ही हो, मगर चालक न तो कभी खाये बगैर रहा है और न रहेगा। राजा का धर्म भी यही होता है कि, चालक को रोके और भावनाओं में बिकने वाले ईमानदार साधारण व्यक्ति को भी अवसर प्रदान करें!ताकि कोई भी भूखा नहीं रह जाय, वर्ना राजा का क्या काम? यदि चालक लूटता रहे और ईमानदार भूखा मरे? मगर जिस राज का राजा ही चालाक हो, वहाँ चालाकियां तो होगी ही। और जाति के नाम पर आस लगाए बैठे लोग हो गए विधवा।

एक बात है इस दुनियां में विधवा भी अनेकों प्रकार की होती है। जैसे आस रांड, पास रांड, रांड, रन्डक्का आदि इनका अर्थ भी है जो आस लगाकर बैठे की पिया विदेश है कभी आएंगे, दूसरा कि पिया पास में मगर रांड की तास अधूरी है, तीसरा जिसका पति मर गया हो, चौथा पति होने के बाद भी पूरा मोहल्ला रांड की तारीफ़ में लगा पड़ा हो आदि आदि। इन दोनों पार्टियों ने उत्तर प्रदेश की जनता का हाल कुछ इस कदर ही किया। क्योंकि राज्य में हिंदुओं और मुसलमानों में भेदभाव किया जाने लगा, मात्र वोट बैंक के आधार पर, हिन्दू मरा तो कोई गम नहीं, मगर मुस्लिम मरा तो पचास लाख़ और बँगला, मुस्लिम जलूसों के लिए हिन्दुओ की मूर्तियां ढकी जाने लगी, मुस्लिम त्योहारों पर मुलायम का पूरा खानदान टोपी में नज़र आने लगा, मुस्लिम लड़के लड़कियों को दसवी पास करने पर तीस तीस हजार देने का प्रचार किया जाने लगा, यदि किसी ने हिन्दुओ को देने की बात कही तो बड़े गर्व के साथ मना भी किया गया, और मना करते भी क्यों नहीं नफ़रत बढ़ाने की राजनीति जो करनी है। यदि हिन्दुओ को भी दिया जाता तो क्या किसी मुसलमान का घाटा हो जाता ? मगर ऐसा इसलिए किया गया  जिससे हिन्दुओ में ग्लानि हो और मुस्लिम वोट दें। मगर हकीकत यही नहीं है कि हर मुस्लिम के साथ ऐसा ही हो रहा। कितने तो मर गए अँधेरे में जिनके सामने कैमरा नहीं लग पाया, जिनके सामने कैमरा लगा वही पाये। सिर्फ कैमरा लगने के बाद ही भेदभाव हिन्दू मुस्लिम दलित अमीर गरीब में होता है, वर्ना रात के अँधेरे में सारे के सारे चालक एक साथ और गरीब बेवकूफ़ लोग एक साथ। फिर भी बेवकूफों के ही वोट से ये सारे ठग लुटेरे चुनाव जीत कर आते है।

एक बात आम गरीब जनता को भलीभांति समझ लेना चाहिए कि अमीर वर्ग जो निहायत ही चालक वर्ग है। यही है नेता, यही है व्यापारी, यही है आपके सगे सम्बन्धी तो आप गरीब तो होंगे ही। यदि अपनी स्थिति सुधारनी है तो सबसे पहले सगे सम्बन्धी होने का ख़याल छोड़े !! सत्ता और धन का लालच ही कुछ ऐसा होता है कि, भाई भाई को नहीं पहचानता, बेटा बाप को भूल जाता है,  आप कौन सी बुद्धिमानी कर रहे है रिस्ता जोड़कर? क्या आप ऐसा नेता नहीं चुन सकते जो संत हो! जिसे माया मोह से मतलब नहीं हो! जिसने सेवा के लिए अपना घर द्वार छोड़ समाज की सेवा करनी ठान ली हो! आप सहयोग करेंगे तो ऐसे लोगों से सुधार शीघ्र संभव होगा वर्ना ये लोग तो सेवा करना छोड़ने वाले नहीं है! मगर इनकी गति धीमी होगी जिसका लाभ आप तक पहुँचने में समय लग सकता है । हो सकता है तब तक देर भी हो जाय।

बाबर की नाजायज हर औलादों से अब कह देना!
बँद करे जयचंद यहाँ पर औ गद्दारो को सह देना !!

Saturday, 2 July 2016

मुस्लिमों की उत्पत्ति से ही, स्वर्ग लोक से अधिक रमणीय और सुन्दर पृथ्वी पर कलयुग का राज स्थापित हुआ

विष्णु भगवान के अवतार:-
1- श्री सनकादि मुनि
2- वराह अवतार
3- नारद अवतार
4- नर-नारायण
5- कपिल मुनि
6- दत्तात्रेय अवतार
7-  यज्ञ
8- भगवान ऋषभदेव
9- आदिराज पृथु
10- मत्स्य अवतार
11- कूर्म अवतार
12- भगवान धन्वन्तरि
13- मोहिनी अवतार
14- भगवान नृसिंह
15- वामन अवतार
16- हयग्रीव अवतार
17- श्रीहरि अवतार
18- परशुराम अवतार
19- महर्षि वेदव्यास
20- हंस अवतार
21- श्रीराम अवतार
22- श्रीकृष्ण अवतार

महाभारत युद्ध के पश्चात घरती पर शुरू हुआ कलयुग, कलयुग के कुछ अपने विचार सिद्धांत अन्य युगों से अलग होने की वजह से धरती पर पल बढ़ रहे जीवों को बदलना इतना आसान नहीं था, श्री विष्णु भगवान के बाइस अवतारों ने सनातन धर्म को इतना मदत किया कि मृत्युलोक स्वर्गलोक से अधिक प्रिय होने लगा यहाँ के दैत्य भी यज्ञ पूजा पाठ करने लगे, जिसकी वजह से देवताओं में भय व्याप्त होने लगा कि मृत्युलोक जब सुन्दर हो जायेगा तो प्रकृति के नियम बदलने होंगे जो कि असंभव है, परन्तु ऐसा सम्भव हुआ तो सारी मर्यादाओं का उलंघन होगा फिर तो विष्णु भगवान ने पुनः तेइसहवां अवतार लिया भगवान गौतम बुद्ध के रूप में।

गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईस्वी पूर्व क्षत्रिय कुल के शाक्य नरेश शुद्धोधन के घर सिद्धार्थ के रूप में हुआ, विवाहोपरांत नवजात शिशु राहुल और पत्नी यशोधरा को त्यागकर, संसार को मरण से उत्पन्न दुखों से मुक्ति दिलाने के मार्ग की तलाश में रात में राजपाठ छोड़कर जंगल चले गए। वर्षों की कठोर साधना के पश्चात बोध गया (बिहार) में बोधी वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे सिद्धार्थ से बुद्ध बन गए।
लगभग 80 वर्षों के बाद 483 ईस्वी पूर्व में उन्होंने मृत्युलोक का परित्याग किया। विश्व के प्राचीनतम धर्मों में से एक बौद्ध धर्म के प्रवर्तक भी बुद्ध भगवान ही थे।

बुद्ध भगवान ने दैत्यों को यज्ञ हवन न करने की सलाह दे देवताओं की मदत की, तथा धरती को प्रकृति के नियमो के अनुसार चलने में कलयुग की मदत की, परन्तु मात्र इतने से कलयुग को संतुष्टि नहीं हुई तब लगभग 470 वर्षो के इंतजार के बाद कलयुग ने यीशु मसीह को चुना अपने संदेशवाहक के रूप में जिन्होंने यहुदिओं को ज्ञान दे ईसाई रूप में परिवर्तित किया। ईसाई धर्म से भी कलयुग को असंतुष्टि ही हुई, फिर लगभग 570 वर्षो के पश्चात पुनः कलयुग ने मुहम्मद पैग़म्बर को अपना दूत बनाया।
मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) का जन्म अरब के रेगिस्तान में मुस्लिम इतिहासकारों के अनुसार 20 अप्रैल 570 ई. में हुआ। जिन्होंने निम्न जीवन साथियो
पत्नी: 1- खदीजा बिन्त खुवायलद
2- सोदा बिन्त ज़मआ
3- आयशा बिन्त अबी बक्र
4- हफ्सा बिन्त उमार
5- ज़य्नाब बिन्त खुज़आयमा
6- हिन्द बिन्त अवि उमय्या
7- ज़ाय्नाब बिन्त जहाश
8- जुवय्रिआ बिन्त अल-हरिथ
9- राम्लाह बिन्त अवि सुफ्याँ
10- रय्हना बिन्त ज़यड
11- सफिय्या बिन्त हुयाय्य
12- मयुमा बिन्त अल-हरिथ
13- मरिया अल-क़ीब्टिय्या
के साथ इंसानो को एक अलग ही जीवन शैली बताई जो आज के कुछ इंसानो को खूब रास आई। जब इतने प्रकार की कलाओं से कोई इंसान गुजारेगा तो स्वाभाविक है मृत्युगति को प्राप्त होना। अतः 8 जून 632 में पैगंबर साहेब कि मृत्यु हुई। समय को ज्ञात है कि यदि किसी से कुछ करवाना है तो सबसे पहले उसे अपने अनुरूप करो और समय ने ऐसा ही किया। फिर देखादेखी अन्य लोगो में भी यही प्रवित्ति जागने लगी और पुरुषों को तन प्रिय और औरतों को धन प्रिय होने लगा। तन धन की चपेट में आकर मनुष्य एक मांस के टुकड़े रूप में नजर आने लगा फिर तो क्या पशु और क्या मानव बदल गया और हो गया मांस प्रेमी दानव।

अल्ला शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द अल्ला से हुई है, "अल्लोपनिषद". चण्डी,भवानी,दुर्गा,अम्बा,पार्वती आदि देवी को आल्ला से सम्बोधित किया जाता है। जिस प्रकार सनातनी लोग मंत्रों में "या" शब्द का प्रयोग करते हैं देवियों को पुकारने में जैसे "या देवी सर्वभूतेषु....", "या वीणा वर ...." वैसे ही मुसलमान भी पुकारते हैं "या अल्लाह"..इससे सिद्ध होता है कि ये अल्लाह शब्द भी ज्यों का त्यों वही रह गया बस अर्थ बदल दिया गया।

सनातन धर्म के अनुयायी भी समय के प्रभाव से निष्क्रिय होने लगे, पहले से ही शक्ति, धन, ज्ञान की चाह ने दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की उपासना के लिए प्रेरित होते मनुष्यों से जटा से शीतल गंगा को प्रवाहित करनेवाले शंकर भगवान को समुद्र मंथन के समय विष पिला दिया तो भगवान शंकर के भक्त गर्म दिमाग और विष पान से भगवा पुरुष तांडव करे तो क्या गलत? मगर जो कुछ भी हो कलयुग ने धरती को अपने अनुसार बना ही लिया। वर्तमान स्थिति और अत्याचार संविधान से कोई भी अछूता नहीं, अबतो न्याय भी धर्म जाति व्यक्ति का मोहताज है। ये कलयुग का असर ही तो है। अब इंतजार कीजिए कि विष्णु भगवान अपने चौबीसहवें अवतार कल्कि भगवान के रूप में प्रगट हो और कलयुग का कार्यकाल समाप्त करें!!

Wednesday, 29 June 2016

छछूंदर भी सर पर लगाये चमेली, कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली, मानवता के पतन की कहानी।

छछूंदर भी सर पर लगाये चमेली, कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली, मानवता के पतन की कहानी।
राजा भोज का दरबार लगा हुआ था लोग ठहाके लगा रहे थे क्योंकि दरबार में किसी को किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं थी प्रजा भी मस्त और प्रशासन भी मस्त परंतु ये दिन भी कुछ खास था कि दरबार में दो व्यक्ति लड़ते झगड़ते प्रवेश किये एक ने जोर से गुहार लगाई राजन न्याय करें! तभी दूसरे ने भी वैसी ही गुहार लगाई। राजा ने दोनों को शांत करवाया और थोड़ी देर आराम करने को कहा, जब वे दोनों थोडा शांत चित्त हुए तो भोज ने एक से पूछा बताओ क्या बात है? वादी बोला राजन मैंने अपनी जमीन दो दिन पहले इन्हें बेच दी थी, आज ये मेरे पास मुद्राओं से भरा हुआ एक घड़ा लेकर आये और बोलरहे है कि ये घड़ा उसी जमीन से निकला है जो तुमने बेचीं है, ये घड़ा तुम्हारा है तुम इसे रखो। राजन जब दो दिन पहले जमीन मैंने बेच दी तो फिर घड़ा मेरा कैसे हुआ? आप इन्हें आदेश दे कि घड़ा ये अपने पास रखें। खरीददार भी बोला राजन मैंने इनसे सिर्फ जमीन खरीदी थी, जब जमीन की खुदाई किया तो उसमें से ये मुद्राओं से भरा घड़ा मिला चूँकि मैंने घड़े की कीमत दी नहीं है तो घड़ा कैसे रखूँ??
राजा ने दोनों से दो दिन का समय माँगा क्योंकि उन दिनों भारतीय संविधान जैसा कुछ भी नहीं था कि धारा इतना इतना के तहत अदालत इस निष्कर्ष पर पहुँची कि निर्भया काण्ड के दोषी नाबालिक को संविधान की कमियो के आधार पर रिहा किया जाता है। उन दिनों तर्क वितर्क के आधार पर उचित न्याय किया जाता था, इसलिए राजा ने अपने मंत्रियों से तर्क वितर्क किया कुछ ने कहा घड़ा क्रेता को, कुछ ने विक्रेता को, कुछ ने कहा संपत्ति राजा की, तो कुछ ने कहा मुद्रा रखने वाले का पता लगा उसे देनी चाहिए। और इतना भी मुश्किल नहीं था कि घड़ा रखने वाले का पता न लगाया जा सके। परंतु उचित न्याय न समझ राजा ने फैसला किया कि इस मुकदमे का फैसला लगभग 1000 साल बाद ईमानदार समझकर जनता जिसे दिल्ली की सत्ता सौपेगी वही करेगा।

राजा भोज परमार वंश के नौंवे राजा थे, धर्म, खगोल विद्या, कला, कोषरचना, भवननिर्माण, काव्य, औषधशास्त्र आदि विभिन्न विषयों के बहुत बड़े ज्ञाता थे जिन्होंने इन विषयों पर पुस्तकें भी लिखी हैं जो आज भी वर्तमान हैं। उन्होने सन् 1000 ई. से 1055 ई. तक राज्य किया। इनकी विद्वता के कारण जनमानस में एक कहावत प्रचलित है, "कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तैली।" सरस्वतीकंठाभरण, शृंगारमंजरी, चंपूरामायण, चारुचर्या, तत्वप्रकाश, व्यवहारसमुच्चय आदि अनेक ग्रंथ इनके लिखे हुए आज भी मौजूद हैं। इनकी सभा सदा बड़े बड़े पंडितों से सुशोभित रहती थी। इनकी पत्नी का नाम लीलावती था जो बहुत बड़ी विदुषी थी।

जब भोज जीवित थे तो कहा जाता था-

अद्य धारा सदाधारा सदालम्बा सरस्वती।
पण्डिता मण्डिताः सर्वे भोजराजे भुवि स्थिते॥
(आज जब भोजराज धरती पर स्थित हैं तो धारा नगरी अच्छे आधार वाली है, सरस्वती को सदा आलम्ब मिला हुआ है,  सभी पंडित आदृत हैं।)

जब उनका देहान्त हुआ तो कहा गया -

अद्य धारा निराधारा निरालंबा सरस्वती।
पण्डिताः खण्डिताः: सर्वे भोजराजे दिवं गते ॥
(आज भोजराज के दिवंगत हो जाने से धारा नगरी निराधार हो गयी है ; सरस्वती बिना आलम्ब की हो गयी हैं और सभी पंडित खंडित हैं।)

ऐसे महान युग का अंत हुआ जहाँ प्रजा भी किसी राजा से कम ईमानदार सत्यनिष्ठ और चरित्रवान नहीं होती थी। खैर एक हजार वर्ष बाद जनता भ्रस्टाचार, कुशासन, अत्याचार, से त्रस्त होकर नए युग नई राजनीति के लिए दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को सत्ता सौपकर प्रयोग किया, जिनकी अदालत में यह मुकदमा फिर से पेश हुआ मगर अब क्रेता विक्रेता नहीं रहे उनके वंशज थे और राजा भोज की जगह गंगू तेली अरविंद केजरीवाल। केजरीवाल ने पूछा बताओ भाई क्या बात है तो विक्रेता के वंशज ने जमीन विक्री की बात बोलते हुए कहा हज़ूर मेरे पूर्वजो ने जमीन बेचीं थी घड़ा नहीं इसलिए घड़ा मुझे मिलना चाहिए। ठीक उसी तरह क्रेता के वंशज ने कहा हुजूर जमीन जब इनके पूर्वजो ने बेचीं तब उस जमीन में घड़ा था या नहीं था यह किसी को नहीं पता मगर जमीन खरीदने के बाद हमारे पूर्वजो के भाग्य से यह घड़ा मिला है इसलिए इस घड़े पर मेरा अधिकार है। केजरीवाल ने सोचा ये तो हमें बेवकूफ समझ रहे है, घड़ा अपने पास रखते हुए, फिर तो क्या आव न देखा न ताव लात मार दी प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव जैसा दोनों को, अब वेचारे कुछ दिन हल्ला गुल्ला किये फिर तो शांत बैठना ही था।

अब सोचने की बात यह है कि देश वही हिन्दू वही मगर इन हजार सालों में ऐसा क्या हुआ? मात्र हमने विदेशी शासकों के साथ कुछ वर्ष क्या गुजारे कि राजा तो राजा प्रजा भी उलट गई, देने की बात लेने पर आ गई, सबके सिद्धांत बदल गए सबके चरित्र बदल गए। विदेशी शासकों ने सिर्फ इस देश से धन ही नहीं लूटा। यदि धन ही लूटा होता तो बड़ी आसानी से हम इन सत्तर सालों में पुनः धनवान हो जाते, मगर उन्होंने जो चरित्र लूटा वो इतनी आसानी से पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। इसके लिए हमें अपनी शिक्षा प्रणाली में सुधार करना होगा, ताकि व्यक्ति सिद्धांतवान हो, सत्यनिष्ठावान हो हमें व्यक्तित्व निर्माण करना होगा तब यह देश पुनः सोने की चिड़िया होगा। अन्यथा ऐसे ही शासक मिलेंगे और ऐसी ही प्रजा होगी जो आरोपी तो आरोपी दोषी को भी सत्ता सौप देगी। यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है सिर्फ कुछ इतिहास और उन युगों की सच्चाई बताने के लिए मैंने राजा भोज और केजरीवाल का नाम लिया। ताकि हम सभी अपने उज्जवल भविष्य का निर्माण कर सके।

धर्मनिरपेक्षता और हिंदुत्व, बहुत हुआ रोजा इफ्तियार, अबकी बार सीमा पर वॉर।

हम आज के इस दौर में कितने चालक है, हमारी शिक्षा, विचार क्रिया प्रतिक्रिया सभी में बस एक ही झलक है पूँजी। हमने अब ये मान लिया है कि इस दुनिया में यदि खुशहाल रहना है तो अपने पास गाड़ी बँगला नौकर चमचा होना जरुरी है और ये सब सम्भव भी मात्र पूँजी से ही है तो जाहिर है कि हमारा ध्यान भी पूँजीवाद पर ही केंद्रित होगा और होना भी चाहिए क्योंकि जब समझ सम्मान पाने तक ही सिमित है तो पूँजीवाद में बुराई क्या है मगर एक बात याद रखनी होगी कि आप और आपकी पूंजी का रखवाला कौन होगा? वो जो चमचों की तरह आपके आगे पीछे चलते है या वो जो मानवता का चेहरा या विकास आप विश्व में कर रहे है।

हमारी इन्ही समझों ने हमें धर्म से विमुक्त कर रखा है, मान सम्मान तो बगैर पूंजी भी मिलता है मगर भौतिक सुखों का अभाव शायद हमें ऐसी जिंदगी जीने को प्रेरित नहीं करती, आज मनुष्य के लिए धर्म मात्र लोकाचार बनकर रह गया है, जिसका उपयोग मात्र शादी व्याह या मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार के समय लगता है। इसीलिए तो हम दैनिक जीवन में इसपर ध्यान नहीं देते वर्ना आज बाजार में, राम बूट हाउस, लक्षमण लेदर स्टोर्स, माँ वैष्णो लस्सी भंडार, शंकर छाप तंबाकू,  बजरंग पान भंडार, गणेश छाप बीडी, लक्ष्मी छाप पटाखे, कृष्णा  बार  ऐंड  रेस्टारेंट, जय माँ अम्बे होटल आदि  हर जगह पर दिखाई देते है। परन्तु कभी आप ने सोचा कि सड़को पर पंचर, बीड़ी, गाड़ी रिपेयरिंग, नाइ या छोटी मोटी दुकान चलानेवाला क्यों अल्लाह छाप गुटका, खुदा छाप बीडी, ईसा मसीह  छाप तंबाकू की दुकान नहीं लगाता???

शायद इतना सोचने की फुरसत नहीं या हमें हिन्दू धर्म बकवास लगता है, बचपन में मुझे भी ऐसा ही लगता था क्योंकि हमारे संस्कार ही ऐसे है हमें बचपन में दयावान, निष्ठावान, अहिंसक, परोपकार की शिक्षा जो मिली है और इसमे बुराई भी कुछ नहीं, मगर जरा सोचें कि बार्डर पर दुश्मन गोलियां चला रहा हो और हम राम राम या ख़ुदा ख़ुदा का जप करें तो वो हमें माफ़ कर देगा हमारी धरती पर कब्ज़ा नहीं करेगा। आप सोच रहे होंगे कि क्या बकवास कर रहे हो ये कोई बार्डर है? तो पढ़े!

वाशिंगटन में 24 चर्च हैं, लन्दन में 71 चर्च, इटली के मिलान शहर में 68 चर्च हैं। जबकि अकेले दिल्ली में 271 चर्च हैं, और समूचे भारत में 3 लाख मस्जिदें हैं इतने धार्मिक स्थल किसी भी देश में नहीं है। आये दिन इन्ही स्थलों को लेकर दंगे फ़साद मार पीट होती रहती है। आप सोचोगे कि इसमें हिंदुओ का भी तो कुछ गलती होगा, तो अवश्य ही आप सच सोच रहे है, वह यही गलती है जो आपको हिन्दू मात्र की ही गलती दिखरही है। यदि कुछ सिखना है तो ईसाईयों  से हम हिन्दू यह सीखे की अपने धर्म का सम्मान कैसे किया जाता है।

इससे भी बड़ा मजाक ये है कि हिन्दू सांप्रदायिक है, क्या आपने ISIS का विरोध करते किसी मुस्लिम को देखा है? फिर RSS का विरोध क्यों होता है?? किसी मुस्लिम को होली दीवाली की पार्टी देते देखा है? नहीं देखा होगा !!  मगर हिन्दुओ को इफ्तार पार्टी देते मैंने देखा है। मैंने कश्मीर में भारत के झंडे जलते देखे है। परन्तु कभी पाकिस्तान का झंडा जलाते हुए मुसलमान नहीं देखा है।  मैंने हिन्दुओ को टोपी पहने मजारो पर जाते देखा है। लेकिन किसी मुस्लिम को टिका लगाते मंदिर जाते नहीं देखा है। मैंने मिडिया को विदेशो के गुण गाते देखा है। मगर भारत के संस्कार के प्रचार करते नहीं देखा है। आखिर इनसब का जिम्मेदार कौन मैं या आप जो सेक्युलिरिज्म की बातें करते हो क्यों नहीं सिखाते यही पाठ उन्हें जो इस कदर अपमान करते है हिन्दू देवी देवताओं का उस समय कहाँ चली जाती है तुम्हारी धर्मनिरपेक्षता??

Monday, 27 June 2016

खुद को कर बुलंद इतना कि हर तहरीर से ईश्वर पूछे कि बन्दे बता तेरी रजा क्या है।

सत्य क्या है? प्रश्न जितना आसान दिखता है उत्तर उतना आसान नहीं। बस इतना ही समझ लें कि जो सनातन है, जो प्राकृतिक है, जिसके साथ किसी भी तरह से छेड़छाड़ नहीं किया गया है, वही सत्य है। सत्य मार्ग पर चलने का मतलब प्रकृति के बनाये किसी भी वस्तु या जीव को आहत किये बगैर अपने स्वार्थ की सिद्धि ही सत्य मार्ग है।

आदर्श व्यवस्था निर्भीक संविधान का गठन भी इसी सत्य को ध्यान में रखकर किया गया है। जिसका तात्पर्य मानवता का उत्थान है, मगर इतना भी आसान नहीं मानवता स्थापित करना, उसके लिए सर्व प्रथम सभी लोग अपने गांव मोहल्ले, फिर  क्रमशः तहसील, जिला, मंडल, प्रदेश, देश, जाति, धर्म और मानवता स्तर पर संगठित हो! तभी मानवीय प्रगति के बारे में कुछ सम्भव है। मगर दिल में ख्याल आ रहा होगा कि जब मानवता की बात है तो इन छोटे छोटे संगठनो को बनाकर क्या हम मानवता को विभाजित तो नहीं कर रहे है। ख्याल उठना भी जायज है। लेकिन हमें सोचना होगा कि यदि मंजिल की दूरी अधिक है तो कई रास्तों को बदल कर पंहुचा जाता है। अधिक दूरी तक सिर्फ एक ही रास्ता नहीं जाता, उसी प्रकार मानवता का कल्याण कोई छोटी मंजिल नहीं जिसे बस सोचा और हो गया, इसे स्थापित करने में कितने पैगम्बर,बौद्ध, जैन, शंकराचार्य, यीशु मसीह आदि गुजर गए मगर गलतफहमी ऐसी की बातें जस की तस।

आइये सर्व प्रथम आदर्श व्यवस्था निर्भीक संविधान से शुभारम्भ करें! और एक दूसरे को जोड़ने का प्रयास करें! क्योंकि "विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीत। बोले राम सकोपि तब भय बिनु होइ न प्रीत।।" कहने का अर्थ कि यदि आप स्वतः सुदृढ़ नहीं होंगे तो दूसरे आपके साथ नहीं जुड़ेंगे इसलिए सर्व प्रथम स्वयं सुदृढ़ हो!!

Sunday, 26 June 2016

नशा शराब में होती तो नाचती बोतल, नशा यदि लालच बन जाए तो जिंदगी होटल।

नशा शराब में होती तो नाचती बोतल, नशा यदि लालच बन जाए तो जिंदगी होटल।
          एक नाइ अपने परिवार सहित खुशहाल जिंदगी जी रहा था, उसके परिवार में दो बच्चे भी थे, नाइ सदैव बड़े बूढ़ो को भगवान की तरह सम्मान देता था। न किसी से तकरार न किसी से रार सबके साथ हँसी ख़ुशी बातें करना, उसकी जिंदगी की खासियत थी। दरवाजे पर आये अतिथि को कभी एहसास ही नहीं होने देता था कि अतिथि अपने घर से दूर है।

नाइ अपनी जीविका चलाने के लिए रोज राजा की हजामत करने जाता था वहा से उसे रोज 100 मुद्राएं मिलती थी उसी से वह दान पूण्य घर गृहस्थी नात रिस्तेदार पास पड़ोस बीबी बच्चों सब को खुश रखता था और स्वगं भी खुश रहता था। नाइ के अंदर तनिक भी लालच नाम की चीज नहीं थी जब कोई उसे कुछ देने की चेष्टा भी करता तो हँस कर बोलता था बाबू सब कुछ आपका ही तो है। आप मेरी ये अमानत अपने पास रखिये समय आने पर मैं ले जाऊँगा। गांव के लोग एक आवाज लगाये नहीं कि नाइ सेवा के लिए हाजिर रहता था, गांव में सबकी हजामत बिना कुछ लिए करता रहता था, फिर भी खुशहाल इतना मानो साक्षात लक्षमी का निवास हो नाइ के घर में। नाइ की ईमानदारी, सेवाधर्म, माया मोह मुक्त, खुशहाली, बड़प्पन आदि की चर्चाए दूर दूर तक होने लगी।

एक दिन नाइ के घर एक ब्राह्मण आया ब्राह्मण ने भी वही देखा जो कभी कही सुना था, तो ब्राह्मण ने नाइ से कहा भाई मेरे पास कोई संतान नहीं है और ये मेरे पास तीन मुद्राओं से भरे घड़े है आप इसे लेलो, क्योंकि अब हमारी उम्र मात्र दो दिन बची है एक दिन में मैं काशी पहुँच जाऊँगा दूसरे दिन मेरी मौत हो जायेगी वहा कोई न कोई दाह संस्कार कर ही देगा, नाइ ने कहा महाराज दाह संस्कार कोई नहीं मैं आपके साथ चलुंगा और करूँगा आपने मुझे भाई कहा तो भाई को अपना फर्ज निभाने दीजिए! मगर हमारी आपसे एक विनती है कि ये मुद्राए काशी लिये चलते है वही जरुरत मंदो में बाट देंगे। ब्राह्मण ने कहा हमारी तो उम्र हो चुकी है और ये मुद्राए हमने आपको इसीलिए दी कि इससमय इसकी आपको जरूरत है, क्योंकि हो सकता है कल राजा अपनी हजामत के लिए किसी और नाइ को रख ले, फिर तो आपको ये मुद्राए काम आएगी। नाइ ने कहा महाराज होने को तो बहुत कुछ हो सकता है मगर अभी मुझे इसकी जरूरत नहीं है, आप मुझसे बड़े और पूज्य है इसलिए आपकी दी हुई मुद्राओ को मैं स्वीकार करता हूँ और आपके ही हित में खर्च करना चाहता हूँ ताकि अगले जन्म में ये आपको वापस मिलें। ब्राह्मण ने कहा भाई ये तो हमें अगले जनम में तो मिलेंगी ही क्योंकि मैंने इसे जो आपको देदी है। यदि आप यह सोचकर दान देना चाहते हो कि इससे मेंरा भला होगा तो वह हो चुका क्योंकि आपने इसे स्वीकार लिया है, अब आप अपने लिए इसे खर्च करें भविष्य में ये आप को काम आएंगी। नाइ मान गया और ब्राह्मण देवता अपनी योजनानुसार चल बसे।

जब नाइ ब्राह्मण देवता का दाह संस्कार करने गया था उसी बीच नाइ के दो भाई शिवपाल और रामगोपाल घर पर आ गए, उनलोगों ने अपने भाई के बारे में भाभी से पूछा तो भाभी ने सबकुछ सच सच बता दिया, और यह भी बता दिया कि आपके भाई साहेब आते ही ये सारी मुद्राओं से हवन यज्ञ दान पूण्य और ब्राह्मणों को भोजन आदि कराएंगे जब तक ये मुद्राएं ख़त्म नहीं हो जाती। इतना सुनते ही दोनों भाइयों के तो होस ही उड़ गए, जैसे समुद्र में रहकर प्यास गजब की लगी हो और पानी पी नहीं सकते। अब शिवपाल तो पक्का बुड़बक था मगर शातिर ऐसा जैसे कालनेमी श्री हनुमान को रोकने की योजना बना रहा हो, मगर रामगोपाल ने बुद्धि लगाई और भाभी को बच्चों का भविष्य दिखा डेढ़ घड़ा अपना हक़ अलग कराने की युक्ति लगाई। अब बच्चों सहित भाभी और दोनों भाई नाइ का इंतजार कर ही रहे थे कि नाइ महोदय आ टपके। आते ही बीबी भुन भुन करने लगी, जब देखो दिन रात दुसरो की सेवा में लगे रहते है, जैसे इनके पास बीबी बच्चे नहीं है, कल कुं अक्लेशवा बड़ा होगा उसके बारे में कुछ सोचा समझा है आप को तो राजा साहेब के यहाँ हजामत करने की नौकरी मिल गई है, कल राजा साहेब भी नहीं रहे तब क्या होगा? चल चल ज्यादा दिमाग मत लगा भगवान है वही सबका भला करेंगे! बीबी तो आग बबूला बोली आप अपना भला भगवान से करवाओ मुझे नहीं करवाना ये भला वला, ऐसा करो आप अपने हिस्से का डेढ़ घड़ा ले जाओ चाहे ब्राह्मण खिलाओ चाहे कुत्ता मगर मेरे हिस्से के घड़े को हाथ नहीं लगाए वर्ना मैं अपने बच्चों सहित अलग हो जाउंगी। फिर भी नाइ नहीं माना बोला तुझे अलग होना है अलग हो जा घड़ा लेना है घड़ा लेजा मेरे हिस्से जो भी आएगा मैं उसे ही दान करूँगा। अब शिवपाल ने बुद्धि लगाई, बोले भाभी डेढ़ घड़ा आप लेलो और डेढ़ घड़े के साथ हम पुरे परिवार सहित भइया का साथ देंगे परोपकार के कार्यो में। नाइ की हालात और लाचारी देख नाइ के चाहनेवालों ने भाभी की बड़ी बेइज्जती की मगर भाभी को मोह जो छाप लिया था और भाभीजी ने अलग होने का निर्णय ले ही लिया।

अब सभी लोगों के सामने एक एक घड़ा बाट दिया गया बाकि बचे तीसरे घड़े को बाटने के लिए एक और घड़ा मंगाकर उसे आधे आधे कर बाटा गया। डेढ़ घड़ा मिलते ही नाइ को उन तीन घड़ो की याद आने लगी जो ब्राह्मण ने दिया था, उसे यह बात सताने लगी कि उसके पास तीन घड़े थे अब डेढ़ ही बचे, फिर तो क्या नाइ दिन रात मेहनत कर उसे तीन बनाने में लग गया। कठिन मेहनत की वजह से नाइ का स्वभाव भी चिडचिढ़ा होने लगा, उसे अपने परिवार के सिवा दुसरो पर विश्वास भी नहीं रहा वह दिनप्रति दिन डिप्रेशन में हो गया। अब स्वभाव बदलने की वजह से राजा के साथ भी व्यवहार उचित नहीं करता था कभी हजामत करते समय ऐसी बहकी बहकी बातें करता था कि राजा को भी क्रोध आ जाय, काफी कुछ राजा ने समझाया मगर नाइ की लालच बढ़ती ही जा रही थी, और घड़ा था कि डेढ़ से दो होने का नाम ही नहीं ले रहा था। एक दिन नाइ की बीबी राजा के यहाँ गई और हजामत के लिये खुद नौकरी मांगी। राजा भी नाइ से परेशान था सोचा चलो इसे भी रख लेते है। अगले दिन नाइ ने देखा कि उसकी बीबी भी राजा की सेवा में लगी हुई है तो नाइ को गुस्सा आया और वह नौकरी छोड़छाड़ चल दिया।

बीबी भी दिनरात मेहनत कर घड़े को भरने में लगा रही थी जिसकी वजह से उसके अंदर लालच का रावण बढ़ता जा रहा था मगर न नाइ का घड़ा दो हुआ और न बीबी का, दोनों की खुशहाल जिंदगी में लालच ने ऐसा घर बनाया कि बच्चे आवारा हो गए उसके भाई बंधू शराबी कबाबी अय्यास। आये दिन रोज गुंडा गर्दी करते लूट घोटाला चोरी ठगी सारे हथकंडे अपना लिए बीबी और नाइ सहित उसके सारे बाल बच्चे और नात रिश्तेदार भाई बंधू जाति बिरादरी के लोग मगर किसी का भी घड़ा डेढ़ से दो नहीं हुआ।

एक दिन नाइ की बीबी से राजा ने पूछा कि बात क्या है जो तुम लोग इतना परेशान हो। नाइन पहले तो हिल्ला हवाली कर रही थी मगर राजा के बहला फुसला कर पूछने पर राजा को घड़े वाली बात बता ही दी फिर तो क्या राजा को सब समझ में आ गया क्योंकि राजा एक संत तपस्वी व्यक्ति था। फिर तो राजा ने नाइ को भी बुलवाया और दोनों को समझाया कि ये डेढ़ का मतलब अधूरी जिंदगी, अकेले तुम हँस तो सकते हो मगर जश्न नहीं मना सकते, जिंदगी जी तो सकते हो मगर महफिल नहीं सजा सकते। लालच माया छोड़ो दोनों फिर से एक हो जाओ और ख़ुशी ख़ुशी अपनी जिंदगी बिताओ। घड़े डेढ़ है उन्हें तीन बनाओ और जिंदगी में फिर से वापस आओ अन्यथा ये लालच जो है खुद तो डूबेगी ही साथ ही साथ अपने कुल खानदान भाई बिरादर नात रिश्तेदार सबको ले डूबेगी। मगर राजा की बात दोनों को तभी तक याद रही जब तक राजा बोल रहा था। आज भी दोनों नौकरी कर रहे है बच्चे दाइयों के हाथ पल बढ़ रहे है, नौकरों ने खाना बनाया तो खाया वर्ना होटलों का रुख कर रहे है मगर घड़ा है कि डेढ़ से दो होता नजर नहीं आता इन्हें कौन समझाये कि भाई लालच छोड़ो घड़ा दो नहीं तीन हो जायेगा अपने आप तीन का मतलब मियां बीबी और बच्चे।

हालात कुछ ऐसे ही है यूपी में माया और मुलायम के साथ ही साथ उनके चाहने वालों के। ये दो ही पार्टियां ऐसी है जो यूपी वालों के घड़े डेढ़ से तीन नहीं होने दे रही है समय रहते जाग जाओ वर्ना समय जब सुलायेगा तो जागने का अवसर फिर नहीं आएगा।