Monday, 6 June 2016

जाट आंदोलन पर एक लेख।

जहाँ सुमति तह सम्पति नाना।
जहाँ कुमति तह बिपति निदाना।।
गोस्वामी तुलसीदास जी की ये पंक्तियाँ सभी को ज्ञात है परन्तु धैर्य उसी को है जिसने इसे अपने ऊपर ढाल लिया।

"करता हूं अनुरोध आज मैं , भारत की सरकार से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार से........."
"वर्ना रेल पटरियों पर जो , फैला आज तमाशा है ,"
"जाट आन्दोलन से फैली , चारो ओर निराशा है........."
"अगला कदम पंजाबी बैठेंगे , महाविकट हडताल पर ,"
"महाराष्ट में प्रबल मराठा , चढ़ जाएंगे भाल पर........."
"राजपूत भी मचल उठेंगे , भुजबल के हथियार से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार से........."
"निर्धन ब्राम्हण वंश एक , दिन परशुराम बन जाएगा ,"
"अपने ही घर के दीपक से , अपना घर जल जाएगा........"
"भडक उठा गृह युध्द अगर , भूकम्प भयानक आएगा ,"
"आरक्षण वादी नेताओं का , सर्वस्व मिटाके जायेगा........"
"अभी सम्भल जाओ मित्रों , इस स्वार्थ भरे व्यापार से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार से........"
"जातिवाद की नही , समस्या मात्र गरीबी वाद है ,"
"जो सवर्ण है पर गरीब है , उनका क्या अपराध है........."
"कुचले दबे लोग जिनके , घर मे न चूल्हा जलता है ,"
"भूखा बच्चा जिस कुटिया में , लोरी खाकर पलता है........"
"समय आ गया है उनका , उत्थान कीजिये प्यार से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार से........."
"जाति गरीबी की कोई भी , नही मित्रवर होती है ,"
"वह अधिकारी है जिसके घर , भूखी मुनिया सोती है........"
"भूखे माता-पिता , दवाई बिना तडपते रहते है ,"
"जातिवाद के कारण , कितने लोग वेदना सहते है........."
"उन्हे न वंचित करो मित्र , संरक्षण के अधिकार से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार से..........।।"

एक समय की बात है, एक लड़के को पोलिस ने चोरी के केस में पकड़ा। लड़के से पूछा कि तुम चोरी क्यों करते हो तो लड़के ने उत्तर दिया कि मेरे घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं होता है। पिताजी जितना कमाते है सब पैसे का शराब पी जाते है, माँ कही मेहनत मजदूरी कर जो भी कमाती है, पिताजी उसे भी झगड़ा झंझट कर उड़ा ले जाते है, माँ को कई बार भूखे सोना पड़ता है, जहाँ मजदूरीं करती है, वहा से कुछ खाने के लिए रोटी मिल जाती है, जिसे माँ खुद न खाकर हम लोगों में बाट देती है, अब बताओ साहेब मैं चोरी नहीं करूँ तो माँ का दर्द कैसे मिटेगा?

तभी पोलिस ने देखा कि कुछ प्रतिष्ठित लोग पत्रकारों के साथ उसी घर में पहुँचे। उन लोगों ने चोर लड़के के दूसरे भाई को बुलाया और उसे एक लाख रुपये का चेक देकर बोले, बेटा ये बताओ तुमने बोर्ड टॉप कैसे किया? तो दूसरा लड़का भी अपने घर की कहानी वही बताई और बोला बताइये सर ऐसी परिस्थितियों में यदि मैं पढ़ता नहीं तो क्या करता बिना पढ़े मेरे घर के हालात कैसे बदलेंगे?

बात परिस्थितियों पर नहीं, बात निर्भर करती है इंसानों की सोच पर, परिस्थितिया कुछ भी हो आप जो बनना चाहते है वह बन सकते है। अब तनिक सोचें कि उपरोक्त कविता सही है? फिर भी सही सही ही होता है। क्योंकि ये आरक्षण होता ही नहीं यदि गांधीजी का नेहरू प्रेम नहीं होता तो दलितों का कल्याणकारी कोई और योजना होती, जिससे किसी की प्रतिभा भी नहीं कटती और कोई भूखा या प्रताड़ित भी नहीं होता, मगर बिष जब पनफ गया है तो इतनी आसानी से मिटेगा नहीं, थोड़ा धैर्य रखें क्या पता आरक्षण की भूख खुद पे खुद मिट जाय।                           

Wednesday, 1 June 2016

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

एक लड़का एक लड़की से प्यार करता था, प्यार भी बेहद लड़की कुछ भी बोले लड़का करने को तैयार, कभी भी वह उसका अहित नहीं सोचता था वह उसे ईश्वर अल्लाह सबकुछ समझता था। मात्र इसलिए कि वह लड़के को अपनी मीठी मीठी बातों से पागल कर चुकि थी। लड़की के प्यार में लड़का अँधा हो चुका था। मगर लड़की दिल से नहीं दिमाग से प्यार करती थी उसे आभास था कि उसका भविष्य कितना सुरक्षित होगा इस बात का उसे एहसास था। एक दिन लड़की बोली तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो लड़का बोला जहाँ से चाँद तारे भी मांगो तो लाकर दूँगा। लड़की बोली चाँद तारे लेकर मैं क्या करुँगी? मुझे भय है कि तू अपनी माँ को बेहद प्यार करता है एक न एक दिन उसके कहने पर मुझसे जुदा हो जायेगा। लड़के ने लाखों सफाई दी लेकिन लड़की मानने को तैयार नहीं, फिर लड़का बोला तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ? लड़की बोली अपनी माँ का दिल लाकर मुझे देदो तो मुझे विश्वास हो जायेगा कि तुम मुझे नहीं छोड़ोगे। लड़का बोला इसमें कौन सी बड़ी बात मैं अभी गया और अभी आया।

इतना कहकर लड़का माँ का दिल लेने चल दिया लड़के का अन्धापन ही कहिए कि लड़के ने माँ का दिल मार कर निकाल ही लिया। दिल लेकर बेतहासा लड़की की तरह दौड़ा रास्ते में ठोकर लगी और लड़का गिर गया। माँ के दिल से आवाज आई बेटा चोट तो नहीं लगी फिर भी प्यार में पागल दिल हाथ में लिए मग़रूर लड़की के पास पंहुचा तो लड़की लड़के के इस कारनामे से बहुत अधिक हतोत्साहित हुई उसे विश्वास ही नहीं था कि कोई इंसान ऐसा भी हो सकता है। उसने तुरंत कहा रे मुर्ख तू इतना खुदगर्ज है मैंने तो तुझे आज जाना। जो व्यक्ति अपनी माँ का नहीं हो सकता वह मेरा क्या होगा जा तू इस हत्या का प्रायश्चित्त कर तेरे लिए यही सजा है।

कहते है प्यार अँधा होता है, प्यार का अन्धापन वह मीठा जहर है जो खाने में तो अच्छा लगता है मगर अंत बुरा होता है। प्यार करना ही है तो उससे कर जिसके बाद कोई दुनियां बचती नहीं गिरा तब भी जीता बचा तब भी। जहा किसी की हार नहीं होती चुनना है तो ईश्वर चुन बेवफ़ा नहीं।

मेरी उजड़ी हुई दुनियां को तू आबाद न कर,
अपने बीते हुए लम्हें ऐ बेवफ़ा तू याद न कर,
कैद में आये घायल परिंदे की बस यही है तमन्ना,
ये भूल चुका है उड़ना तू इसे कभी आजाद न कर।
इन शेरों शायरियों से ऊपर उठें ये तो प्रतिरोधक है इस ज़माने के। इनके चक्कर में इतना खुदगर्ज न बने कि बाद में प्रायिश्चित करने का अवसर भी न मिले।

ज़िन्दगी के पाँच सच सदा याद रखें!

1- माँ के सिवा कोई वफादार नही हो सकता…!!!

2- गरीब का कोई दोस्त नही हो सकता…!!

3- आज भी लोग अच्छी सोच को नही,
अच्छी सूरत को तरजीह देते हैं…!!!

४- इज्जत सिर्फ पैसे की है, इंसान की नही…!!!

५- जिस शख्स को अपना खास समझो….
अधिकतर वही शख्स दुख दर्द देता है…!!!

गीता में लिखे के अनुसार कुछ ऐसा बोल सकते है।

अगर कोई इन्सान,बहुत हंसता है , तो अंदर से वो बहुत अकेला है।

अगर कोई इन्सान बहुत सोता है , तो वह अंदर से बहुत उदास है।

अगर कोई इन्सान खुद को बहुत मजबूत दिखाने की कोशिश करता है और रोता नही , तो वह अंदर से बहुत कमजोर है।

अगर कोई जरा जरा सी बात पर रो देता है, तो वो बहुत मासूम और नाजुक दिल का है।

अगर कोई हर बात पर नाराज़ हो जाता है, तो वह अंदर से बहुत अकेला और जिन्दगी में प्यार की कमी महसूस करता है।

लोगों को समझने की कोशिश कीजिये ,जिन्दगी किसी का इंतज़ार नही करती , लोगों को एहसास कराइए की वह आप के लिए कितने खास है।

1- कुछ पाने के लिए विकल्प बदले जाते है संकल्प नहीं।

2- जब सड़क पर बारात नाच रही होती हो तो हॉर्न मार-मार के परेशान ना हो...... गाडी से उतरकर थोड़ा नाच लें!  मन शान्त होगा। टाइम तो उतना लगना ही है..! कहने का मतलब दूसरों की खुशियों से परेशान न हो सो सके तो खुश होले वर्ना समय आपको बदल देगा।

3- रास्ते में अगर मंदिर देखो तो, प्रार्थना नहीं करो तो चलेगा . . पर रास्ते में एम्बुलेंस मिले तब प्रार्थना जरूर करना, शायद किसी की जिन्दगी बच जाये। क्योंकि मंदिर देख प्रार्थना आप अपने लिये करेंगे मगर एम्बुलेंस देख किसी गैर के लिये गैर पर किया उपकार ही धर्म है।

4-  जो संघर्षरत हैं, वह लाख बार हार के भी, नही हार सकता..!

5-  बादाम खाने से उतनी अक्ल नहीं आती...जितनी धोखा खाने से आती है.....!

6-  एक बहुत अच्छी बात जो जिन्दगी भर याद रखिये! आप का खुश रहना ही आप का बुरा चाहने वालों के लिए सबसे बड़ी सजा है....!

7- खुबसूरत लोग हमेशा अच्छे नहीं होते, अच्छे लोग हमेशा खूबसूरत नहीं होते...!

8- रिश्ते और रास्ते एक ही सिक्के के दो पहलु हैं... कभी रिश्ते निभाते निभाते रास्ते खो जाते हैं, और कभी रास्तो पर चलते चलते रिश्ते बन जाते हैं...!

9- बेहतरीन इंसान अपनी मीठी जुबान से ही जाना जाता है, वर्ना अच्छी बातें तो दीवारों पर भी लिखी होती है...!

सम्राट चंद्रगुप्त ने एक बार चाणक्य से कहा, चाणक्य, काश तुम खूबसूरत होते?

चाणक्य ने कहा, 'राजन, इंसान की पहचान उसके गुणों से होती है, रूप से नहीं।'

तब चंद्रगुप्त ने पूछा, 'क्या कोई ऐसा उदाहरण दे सकते हो जहां गुण के सामने रूप छोटा रह गया हो।'

तब चाणक्य ने राजा को दो गिलास पानी पीने को दिया।

फिर चाणक्य ने कहा, 'पहले गिलास का पानी सोने के घड़े का था और दूसरे गिलास का पानी मिट्टी के घड़े का, आपको कौन सा पानी अच्छा लगा।'

चंद्रगुप्त बोले, 'मटकी से भरे गिलास का।'

नजदीक ही सम्राट चंद्रगुप्त की पत्नी मौजूद थीं, वह इस उदाहरण से काफी प्रभावित हुई।

उन्होंने कहा, 'वो सोने का घड़ा किस काम का जो प्यास न बुझा सके।

मटकी भले ही कितनी कुरुप हो, लेकिन प्यास मटकी के पानी से ही बुझती है, यानी रूप नहीं गुण महान होता है।'

इसी तरह इंसान अपने रूप के कारण नहीं बल्कि उपने गुणों के कारण पूजा जाता है।

रूप तो आज है, कल नहीं लेकिन गुण जब तक जीवन है तब तक जिंदा रहते हैं, और मरने के बाद भी जीवंत रहते हैं।

पहले मैं होशियार था। इसलिए दुनिया बदलने चला था और आज मैं समझदार हो गया हूँ। इसलिए खुद को बदल रहा हूँ...।।

बात तो अच्छी है खुद को बदलना ही चाहिए! कहते है ज़माना ख़राब मगर आपको अच्छा बनने से किसने रोका है।

बुरा जो खोजन मैं चला बुरा न मिलिया कोय।
जौ दिल खोजों आपनों मुझसे बुरा न कोय।।

इन सभी बातों से भी बड़ी बात सब बातों का निष्कर्ष है कि-

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय ।

सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।

अर्थात- हे धनञ्जय अर्जुन कामना को त्याग कर सफलता और असफलता को एक समान मान कर तू अपने कर्म के प्रति एकाग्र रह। कर्म का कोई फल मिले या न मिले।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

अर्थात तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू फल की दृष्टि से कर्म मत कर और न ही ऐसा सोच की फल की आशा के बिना कर्म क्यों करूं।

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः ॥

जिसके सभी कर्म कामना रहित  हैं और जिसके सभी कर्म ज्ञान रूपी अग्नि से भस्म हो गए हैं, उनको बुद्धिमान लोग पंडित की उपाधि से विभूषित करते हैं।

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबंधनैः ।

सन्न्यासयोगमुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि।।

ऐसा करने से तू कर्मों के शुभ-अशुभ फल से मुक्त हो जायेगा। कर्मों के फल का त्याग कर तू संन्यासी योगी होकर मुझसे आ मिलेगा।

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।

ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्‌ ॥

अर्थात- मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूं, न कोई मेरा अप्रिय है, न प्रिय है, परंतु जो भक्त मुझको प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूं। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान भी अपनी कृपा करने में भेदभाव  करते हैं – किसी पंर अपनी अधिक कृपा करते हैं और किसी पर कम। जबकि इस श्लोक में भगवान कहते हैं कि मैं सब भक्तों के प्रति समभाव रखता हूं।

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु: कौशलम-

अर्थात- निश्चित बुद्धि वाला व्यक्ति अच्छे और बुरे दोनों ही  प्रकार के फलों का भागी नहीं  होता| इसलिए तू कर्म करते समय अपनी बुद्धि को स्थिर रख। इसी कुशलता को योग कहते हैं।सामान्यतः व्यक्ति अच्छे कर्मों के पुण्य का भागी होना चाहता है, परन्तु  भगवान कहते हैं की जिस तरह बुरे कर्म के लिए पाप का भागी होना उचित नहीं है, उसी तरह से पुण्य फल की इच्छा रखना भी उचित नहीं है।

१.  निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु अवश्य होगी।प्रत्येक मनुष्य के जन्म और मृत्यु का समय निश्चित है और वह आज ही है।

२. ईश्वर ने सभी प्राणियों को कर्म करने का अधिकार दिया है, लेकिन उस कर्म के फल पर उनका कोई अधिकार नहीं है। प्रत्येक का भाग्य उस के कर्म से बंधा है अर्थात हर मनुष्य अपने भाग्य का रचयिता है।

३.प्रत्येक मनुष्य के लिए  परिस्थिति के अनुसार अपनी बुद्धि का प्रयोग करना आवश्यक है। सभी लोगों से अपेक्षित है की वे अपनी योग्यता, बुद्धि और पूर्ण ध्यान से अपना कर्त्तव्य समझ कर कर्म करें।

४. सभी से अपेक्षित है की वे अपने कर्म के प्रति निर्णय सोच विचार कर लें! निर्णय लेने के बाद उस पर कार्य रणभूमि के सैनिक की तरह से लें, यही कर्मयोग है।

अपने लिए नहीं अब यारोँ, देश की खातिर चलना होगा।।

वियोग छुपाकर हँसना होगा,
दर्द तुम्हे सब सहना होगा,
हार जीत की फ़िक्र किये बिन,
संघर्ष तुम्हे अब करना होगा।
भारत माँ को लूट रहे जन,
जंग हटा दो हथियारों से,
सूरज की परवाह किये बिन,
रोशन कर दो उजियारों से,
खुद की चिंता छोड़ हे प्यारे,
घनघोर घटा में चलना होगा।
बिना जले रोशन ना होगा,
भारत माँ का अंधियारा,
घोटालेबाजों के युग में,
जलना है कर्तव्य तुम्हारा,
दीपक बिना जले इस जग में,
कहा उजाला करता है,
दीपक के जलने पर यारों,
लाख पतिंगा मरता है।
जीवन का उद्देश्य समझ लो,
परोपकार का भेष पहन लो,
दर्द रोक ना पाऊं दिल में,
इसको आँखों में बहना होगा,
अपनी खातिर नहीं सही पर,
देश की खातिर जलना होगा।
सफ़र चलोगे लगेगा कांटा,
पर पहनके जूता फिक्र नहीं,
कठिन सफ़र है पग में छाले,
छालों को भी सहना होगा,
अपनों ने छालों को दिया है,
गिला न उससे करना होगा,
अपने खातिर सब जलते है,
हमें न खुद पर जलना होगा,
अपने लिए नहीं अब यारों,
सबकी खातिर गलना होगा।
घनी घोर अंधियार घटाएं,
डगर न सूझे पर पाव बढ़ाये,
लालच की अब इस बगिया में,
फूल पर हम क्यों दिल मंडराएं,
फूल उन्हें कर देंगे मुबारक,
लालच पे जिनकों मरना होगा,
दर्द में जीवन फूल में काँटों को,
अपना ख़ुसबु चुनना होगा,
अपने लिए नहीं अब यारोँ,
देश की खातिर चलना होगा।।

Tuesday, 31 May 2016

जो भी मुझ तक आता है, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं।

विवेकानंद जी का विश्व प्रसिद्ध भाषण स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर 1893 को शिकागो (अमेरिका) में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में एक बेहद चर्चित भाषण दिया था। स्वामी विवेकानंद का जब भी जिक्र आता है उनके इस भाषण की चर्चा जरूर होती है। विवेकानंद का भाषण... अमेरिका के बहनों और भाइयों... आपके इस स्नेहपूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूँ । मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जाति, संप्रदाय के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं। मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी है जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ , जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूँ , जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इजराइलियों की पवित्र स्मृतियाँ संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ , जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है। भाइयों , मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियाँ सुनाना चाहूँगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है ; जिस तरह अलग-अलग स्त्रोतों से निकली विभिन्न नदियाँ अंत में समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है। वे देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, पर सभी भगवान तक ही जाते हैं। वर्तमान सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है - जो भी मुझ तक आता है, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं। लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुँचते हैं। सांप्रदायिकताएँ, कट्टरताएँ और इसके भयानक वंशज हठधमिर्ता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है। कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है। कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं। अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा।
            -स्वामी विवेकानंद।

जिंदगी में सदैव संकल्प नहीं विकल्प बदले जाते है।।

गलती निकालने के लिए भेजा चाहिए..परन्तु
गलती कबूल करने के लिए कलेजा चाहिए।

प्यार में सबसे बड़ा खुशनसीब वह जो झुक जाए
और सबसे बड़ा बदनसीब वह जो अकड़ जाए।

बीते कल का अफ़सोस और आनेवाले कल की चिंता
दो ऐसे चोर हैं जो हमारे आज की ख़ूबसूरती को चुरा ले जाते हैं।

क्रोध करने का मतलब है दूसरों की गलतियों की सज़ा स्वयं को देना।

जीत और हार आपकी सोच पर ही निर्भर करता है
मान लिया तो हार होगी ठान लिया तो जीत होगी।

किसी के गुणों की प्रशंसा करके अपना समय नष्ट मत करो !
बल्कि उसके गुणों को खुद अपनाने की कोशिश करो !

सीढ़ियां उन्हे मुबारक हो जिन्हे छत तक जाना है !
मेरी मंज़िल तो आसमान है रास्ता खुद मुझे  बनाना है!

जब बिल्कुल अंधकार होता है, तब इंसान सितारे देख पाता है ।

फ़ितरत सोच और हालातों में फर्क है, अन्यथा इंसान कैसा भी हो मगर दिल का बुरा नहीं होता।

जीवन में सबसे बड़ी ख़ुशी उस काम को करने में है, जिसे लोग कहते हैं कि तुम नहीं कर सकते!

परिंदों को मिलेगी मंज़िल यक़ीनन ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं ।
जो लोग रहते हैं खामोश अक्सर ज़माने में जिनके हुनर बोलते हैं।।

हमेशा छोटी-छोटी गलतियों से बचने की कोशिश किया करें !
क्योंकि इंसान पहाड़ों से नहीं पत्थरों से ठोकर खाता है।।

अपने उद्देश्य को पाने के लिए संघर्ष करना निष्क्रिय रहने से कहीं अधिक बेहतर है ।

जीते जी के झगडे हैं ये तेरा है ये मेरा है, जब चले गए दुनिया से तब न कुछ तेरा है न मेरा है ।।

जिस मनुष्य में आत्मविश्वास नहीं है, वह शक्तिशाली होकर भी कायर है और विद्वान होकर भी मूर्ख है।।

बेहतरीन इंसान अपनी मीठी जुबान से ही जाना जाता है, वर्ना अच्छी बातें तो दीवारों पर भी लिखी होती हैं ।।

शौक नही है हमे मशहुर होने का...पर क्या करे...इस चेहरे का, जिसे लोग देखते ही पहचान लेते है !..

मुस्कुराओ...!!

क्रोध में दिया गया आशीर्वाद भी बुरा लगता है, और  मुस्कुराकर कहे गए बुरे...शब्द भी अच्छे लगते है।।

मनुष्य अपने अभाव से इतना दुखी नहीं है;
जितना दूसरे के प्रभाव से दुखी होता है।।

जिंदगी में सदैव संकल्प नहीं विकल्प बदले जाते है।।

Sunday, 29 May 2016

दोनों में से अगर मूद ली किसी ने भी आँखे। रुठने वाले जरा सोच फिर पछतायेगा कौन।।

रुठने वाले तो भगवान से रूठ जाते है।
रुठने वाले पता नहीं क्या मजा पाते है।।
मगर तुम रूठो और मैं रूठूँ पर मानाने में।
हर पल रूठना आसान है इस ज़माने में।।
कैद कर लेता है जब अपनी वफाओ में।
गलफहमी छोड़ देता बहकी फिजाओ में।।
मगर हवा का रुख कुछ अजीब सा होता।
दोस्त सदा हँसता और रुठने वाला रोता।।
बीत जाएंगे पचपन तब शुरू होगा बचपन।
घर आयेंगे जो मेरे पूछेगें सिर्फ एक सवाल।।
अब स्वास्थ कैसा है और बच्चे क्या करते।
कोई ना पूछे पूंजी या गाड़िया कितनी रखते।।
फिर गलतफहमी किस लिए दोस्त है करते।
थोड़ी सी लालच में दोस्ती भूल धन पे मरते।।
नाकाम खुद होते मगर ईर्श्या दोस्तों से करते।
छोटी छोटी अनकही बातें दिल पर धरते।।
हठ में सदा कुघात होता उस पर जो सगा।
क्या बिगाड़ लोगें उसका जो प्यार में भगा।।
हठ से जीत भी जाओ तो जहाँ में हारा कौन।
जितने वाले सोच तुम्हें दुनिया में प्यारा कौन।।
जीत में मिलने से कही अधिक गवां तो न दोगे।
दुःखी कर उसको जीत का कैसे बदला लोगे।।
सोचों तुम रूठे हम रूठे तो मनायेगा कौन।
अपने खेल में अहंकार को हराएगा कौन।।
दोनों में से अगर मूद ली किसी ने भी आँखे।
रुठने वाले जरा सोच फिर पछतायेगा कौन।।

Friday, 27 May 2016

इसलिए प्यास ऐसी ना लगे कि जहर मिला पानी पी जाओ। मंजिल छोड़ कर्तव्य चुन और हमसफ़र संग जी जाओ।।

हर कोई परेशान है हैरान है मंजिल की चाह में।
एक दूसरे से धक्का मुक्की करता रहता है राह में।।
हमसफ़र के चक्कर में सफलता छोड़ने की चाह नहीं।
भीड़ बहुत है इस ज़माने में मगर निकलने की राह नहीं।।
चाहत लगी है गजब की यारों मगर  दिल में प्यार नहीं।
लगन लगी है अजीब सी मगर मिलता कोई यार नहीं।।
अगर उसका हाथ पकड़ो तो है मंजिल छूटने का डर।
अगर वो नहीं है साथ में तो मंजिल पाकर भी है बेखबर।।
अजीब सी कसमकस है इस सफलता के दीवानों को।
वें छोड़ने पर आमादा है इस वक्त भीड़ के परवानों को।।
कहते है मेरे दिल में प्यार है मगर दीवानगी नहीं।
समझने का फेर है उनमें, जिनमें है मरदानगी नहीं।।
सफलता वो है जिसमें खूब जबरजस्त बेवफाई है।
पाने वाला भी हरजाई है और न पाने वाले की तन्हाई है।।
मंजिल का क्या ये मिल जाती है तो वो छूट जाती है।
मगर जो छोड़ आये वो चली गई फिर कभी नहीं आती है।।
पहुँचकर मंजिल पे अनजान सा बेजान हुआ जाता है।
बिना हमसफ़र के इस दुनियां में कुछ भी नहीं भाता है।
इसलिए प्यास ऐसी ना लगे कि जहर मिला पानी पी जाओ।
मंजिल छोड़ कर्तव्य चुन और हमसफ़र संग जी जाओ।।
मंजिल आज ये कल वो होगी उसके लिए बरबाद ना हो।
उस बेरुख़े इंसान को ना देख जो जीवन में आबाद ना हो।।
कर्तव्य सदा साथ रहेगा जीवन और मरण के बाद भी।
सफलता की क्या है जो मंजिल पाकर होता अनाथ भी।।
आएगा एक दिन वो जब चार कंधो पर उठ जायेगा।
तेरी मंजिल या सफलता नहीं किया हुआ ही रुलाएगा।।
आगे सफ़र है पीछे हमसफ़र यदि चलूँ तो हमसफ़र रूठे।
तू ही बता मेरे ऐ दोस्त क्या करूँ यदि ना चलूँ तो सफ़र रूठे।।
ऐ दोस्त किसने कहा कि मत चल चल मगर बेरुख़े ना बन।
सपूत जुटाए और कपूत उड़ाए फिर तू सनचत का धन।।
रही बात मंजिल की तो मंजिल इतनी छोटी ना कर।
आज ये रही कल वो सही इस घाट से उस घाट जाकर।।
जब समझे अपनी असली मंजिल तो बहुत देर ना हो जाए।
जीवन भर आधी छोड़ पूरी पर दौड़े आधी रही न पूरी पाये।।