Monday, 23 May 2016

कटु सत्य है कि सनातन धर्म सभी धर्मो का जनक है।

सनातन धर्म जो आदि काल से ब्रह्माण्ड में विद्यमान है जिसके ज्ञान विज्ञान से से संपूर्ण ब्रह्माण्ड प्रकाशमान है वही जनक है वही संघारक है। बौद्ध, ईसाई, जैन, सिख,मुस्लिम आदि धर्मों का। कुछ ने बैर नहीं किया तो वे आज भी व्यक्तित्व निर्माण कर रहे है और जिन्होंने विरोध अपनाया सनातन धर्म से वे आतंक पड़ोस रहे है समाज और संसार में। यदि कोई अपने दोनों हाथों से दोनों आँखों को बंद कर ले तो सूर्यास्त नहीं हो जाता उसी प्रकार झूठ छुपाने से मात्र झूठ छुपता है सत्य नहीं।सनातन का अर्थ होता है सदा बने रहने वाला जिसका न अंत हो और जो पैदा नहीं प्रगट हुआ हो वही विद्यमान है सनातन।

हिन्दू धर्म, वैदिक धर्म के नाम से भी जाना जाता है सनातन धर्म, सिन्धु नदी के पार के वासियो को ईरानवासी हिन्दू कहते, जो 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। उनकी देखा-देखी अरब हमलावर भी तत्कालीन भारतवासियों को हिन्दू और उनके धर्म को हिन्दू धर्म कहने लगे। भारत के अपने साहित्य में हिन्दू शब्द कोई १००० वर्ष पूर्व ही मिलता है, उसके पहले नहीं। 

भारत और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र की सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म के कई चिह्न मिलते हैं। इनमें एक अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, लिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं।

गणेशकी, वैष्णव विष्णु की, शैवदेव -  अनेकों शिव की, शाक्त शक्ति की और सौर सूर्य की पूजा आराधना करने के आधार पर अलग अलग पांच संप्रदाय है। विष्णु, शिव और शक्ति आदि देवी-देवता परस्पर एक दूसरे के भी भक्त होने की वजह से सारे सम्प्रदायों का ज्ञान और एकीकरण ही सनातन धर्म है। सनातन धर्म में विष्णु, शिव और शक्ति सब एक समान है। मात्र यही एक धर्म है जो बोलता है ईष्वर एक है, पूजा पद्धतियाँ अनेक जहा यदि भक्त पहलवान तो भगवान हनुमान है।

हिन्दू धर्म में कोई एक अकेले सिद्धान्तों का समूह नहीं है जिसे सभी हिन्दुओं को मानना ज़रूरी है। ये तो धर्म से ज़्यादा एक जीवन का मार्ग है। हिन्दुओं का कोई केन्द्रीय चर्च या धर्मसंगठन नहीं है और न ही कोई "पोप" या "पैग़म्बर" है। इसके अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं और सभी को बराबर की श्रद्धा दी जाती है, और सभी सम्प्रदायों की उत्पत्ति करने वाला को ही सनातन धर्म कहते है।

सनातन धर्म, हिन्दू-धर्म हिन्दू-कौन?
गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवे च दृढ़ा मतिः। पुनर्जन्मनि विश्वासः स वै हिन्दुरिति स्मृतः।।
अर्थात-- गोमाता में जिसकी भक्ति हो, प्रणव जिसका पूज्य मन्त्र हो, पुनर्जन्म में जिसका विश्वास हो! वही हिन्दू है।
मेरुतन्त्र ३३ प्रकरण के अनुसार  "हीनं दूषयति स हिन्दु "
अर्थात जो हीनता या नीचता को दूषित समझता है और उसका त्याग करता है वह हिन्दु है।

लोकमान्य तिलक के अनुसार- असिन्धोः सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।।

अर्थात्- सिन्धु नदी के उद्गम-स्थान से लेकर सिन्धु हिन्द महासागर तक सम्पूर्ण भारत भूमि जिसकी पितृभू अथवा मातृ भूमि तथा पुण्यभू पवित्र भूमि है, और उसका धर्म हिन्दुत्व है।
हिन्दु शब्द मूलतः फारसी है इसका अर्थ उन भारतीयों से है जो भारतवर्ष के प्राचीन ग्रन्थों, वेदों, पुराणों में वर्णित भारतवर्ष की सीमा के मूल एवं पैदायसी प्राचीन निवासी हैं। कालिका पुराण, मेदनी कोष आदि के आधार पर वर्तमान हिन्दू ला के मूलभूत आधारों के अनुसार वेदप्रतिपादित रीति से वैदिक धर्म में विश्वास रखने वाला हिन्दू है।

हिन्दू धर्म के सिद्धान्त के कुछ मुख्य बिन्दु:

1. ईश्वर एक नाम अनेक।

2. ब्रह्म या परम तत्त्व सर्वव्यापी है।

3. ईश्वर से डरें नहीं, प्रेम करें और प्रेरणा लें।

4. हिन्दुत्व का लक्ष्य स्वर्ग-नरक से ऊपर।

5. हिन्दुओं में कोई एक पैगम्बर नहीं है।

6. धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर बार-बार पैदा होते हैं।

7. परोपकार पुण्य है, दूसरों को कष्ट देना पाप है।

8. जीवमात्र की सेवा ही परमात्मा की सेवा है.

9. स्त्री आदरणीय है।

10. सती का अर्थ पति के प्रति सत्यनिष्ठा है।

11. हिन्दुत्व का वास हिन्दू के मन, संस्कार और परम्पराओं में।

12. पर्यावरण की रक्षा को उच्च प्राथमिकता।

13. हिन्दू दृष्टि समतावादी एवं समन्वयवादी।

14. आत्मा अजर-अमर है।

15. सबसे बड़ा मंत्र गायत्री मंत्र।

ॐ भूर्भुव स्वः। तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ 

हिन्दी में भावार्थ - उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे!

16. हिन्दुओं के पर्व और त्योहार खुशियों से जुड़े हैं।

17. हिन्दुत्व का लक्ष्य पुरुषार्थ है और मध्य मार्ग को सर्वोत्तम माना गया है।

18. हिन्दुत्व एकत्व का दर्शन है।

Saturday, 21 May 2016

भीष्मपितामह हो या गांधीजी या जनता संगत दोषी बना ही देता है इसीलिए सावधान रहे!

किसी ने खूब कहा कि माननीय PM जी,
कृपया सारी योजना बंद कर दीजिये।
सिर्फ सांसद भवन जैसी कैन्टीन हर दस किलोमीटर पर खुलवा दीजिये ।
सारे लफड़े खत्म।
29 रूपये में भरपेट खाना मिलेगा ।
80% लोगों को घर चलाने का लफड़ा खत्म।
ना सिलेंडर लाना, ना राशन
और
घर वाली भी खुश ।
चारों तरफ खुशियाँ ही रहेगी।
फिर हम कहेंगे सबका साथ सबका विकास ।
सबसे बड़ा फायदा 1 रूपया किलो गेहूँ नहीं देना पड़ेगा।
और PM जी को ये ना कहना पड़ेगा कि मिडिल क्लास के लोग अपने हिसाब से घर चलाएँ ।

इस पे गौर करें

कृपया कड़ी मेहनत से प्राप्त हुई ये जानकारी देश के हर एक नागरिक तक पहुँचाने की कोशिश करे ।

शान है या छलावा...।

पूरे  भारत  में एक ही  जगह ऐसी  है  जहाँ खाने  की चीजें  सबसे सस्ती है ।

चाय = 1.00

सुप = 5.50

दाल= 1.50

खाना =2.00

चपाती  =1.00

डोसा = 4.00

बिरयानी=8.00

ये  सब चीजें  सिर्फ  गरीबों के  लिए  है  और ये सब Available है  Indian Parliament Canteen में।

और  उन  गरीबों की  पगार है  80,000 रूपये  महीना वो  भी  बिना income tax के ।

कि यही कारण  है  कि  इन्हें लगता है  कि जो  आदमी  30 या 32 रूपये  रोज  कमाता है  वो गरीब  नहीं हैं।

हमें भी ऐसी बातें अच्छी लगती है और लगे भी क्यों नहीं क्योंकि यह इतना असत्य भी नहीं, परन्तु सवाल ये नहीं कि सत्य क्या है होना क्या चाहिए और हो क्या रहा है। मगर सिर्फ एक लालच है जो सारी बुद्धिमत्ता को चौपट कर देती है। हम सोचने लगते है जैसे इन सब बातों का गुनहगार सिर्फ मोदीजी है, जैसे इन सारी योजनाओं की शुरुआत मोदीजी ने की हो। जब तनिक लालच से दूर होंगे तो असलियत अपने आप स्पष्ट हो जायेगी कि इसका प्रचार प्रसार क्यों हो रहा है इसके पीछे मकसद क्या है खैर उद्देश्य कुछ भी मगर होना क्या चाहिए ये तो दूर की बात है, जब हम एक सांसद नहीं है तो क्या पता ये जो कुछ सांसदों को मिल रहा है वह कम है या ज्यादा। परन्तु कुछ इन बातों पर भी ध्यान देना चाहिए न कि सिर्फ सोनिया,माया,मुलायम, लालू, केजरीवाल, नितीश कुमार, जय ललिता, येचुरी आदि जैसे नेताओं के ग्लैमर पर।

आपने आजीवन सांसद रहे माननीय अटल बिहारी बाजपेयी को देखा या सुना होगा, लालबहादुर शास्त्री जी को जानते होंगे, सरदार पटेल? नहीं तो बिहार के करपूरी ठाकुर अब कितने नाम लूँ चलिए श्री नरेंद्र मोदीजी को तो देख ही रहे है जो सैलरी तो छोड़िए मिला गिफ्ट भी दान दे देते है। कभी उनके परिवार या नात रिस्तेदार को देखा है अगर नहीं तो थोड़ी शरम तो कर लो इज्जत नहीं घटेंगी! मगर नेताओँ की तुलना उस गरीब से जो दो वक्त की रोटी भी नहीं जुटा पा रहा हो कही से भी जायज नहीं क्योंकि दोनों का अपना अपना प्रभाव है दोनों का अलग अलग स्वभाव है। गरीब को रोटी मिलनी चाहिए परन्तु देश में और भी व्यवस्था को अनदेखा करके सम्भव नहीं जब रोटी देनेवाला ही नहीं होगा तो व्यंग किसपर कसोगे?

खैर राजनीति भी कुछ इस कदर गन्दी हो चुकी है कि अर्थ का अनर्थ गढ़ते देर नहीं लगता, कभी भी कुछ भी वयान के जरिये सुनने वाले को समझाया जा सकता है इसीलिए तो अदालतों में फैसले भी प्रभावित होते रहे है। इसका एक जीता जागता उदाहरण है नाथूराम गोडसे का जीवन, अब सोचने की बात है कि जिसे पता था कि वह क्या कर रहा है और उसका परिणाम क्या होगा फिर भी उसने अपने लिए फाँसी चुनी। क्यों?

माना कि गांधीजी ने खूब कष्ट सहा बड़े ईमानदार सत्यनिष्ठावान व्यक्ति थे उनकी वजह से भारत का गौरव भी बढ़ा मगर ये पक्तियां पढ़ें किसी ने खूब कहा है।

किन्तु अहिंसा सत्य कभी अपनों पर ही ठन जाता है ।
घी और शहद अमृत हैं पर मिलकर के विष बन जाता है ॥

अपने सारे निर्णय हम पर थोप रहे थे गांधी जी ।
तुष्टिकरण के खुनी खंजर घोंप रहे थे गांधी जी ॥

महाक्रांति का हर नायक तो उनके लिए खिलौना था ।
उनके हठ के आगे तब जम्बूदीप हमारा बौना था ॥

इसिलिये भारत अखण्ड, भारत अखण्ड का दौर गया ।
भारत से पंजाब सिंध रावलपिंडी और लाहौर गया ॥

तब जाकर के सफल हुए जालिम जिन्ना के मंसूबे ।
गांधी जी ने अपनी ही जिद में पुरे भारत को लेडूबे ॥

भारत के इतिहासकार थे चाटुकार दरबारों में ।
अपना सब कुछ बेच चुके थे नेहरू के परिवारों में ॥

भारत का सच लिख पाना था उनके बस की बात नहीं ।
वैसे भी सूरज को लिख पाना जुगनू की औकात नहीं ॥

जो जिन्ना जैसे राक्षस से मिलने जुलने जाते थे ।
जिनके कपड़े लन्दन पेरिस दुबई धुलने जाते थे ॥

कायरता का नशा दिया है गांधी के पैमानो ने ।
भारत को बर्बाद किया नेहरू के राजघरानो ने ॥

हिन्दू अरमानों की जलती एक चिता थे गांधी जी ।
कौरव का साथ निभाने वाले भीष्म पिता थे गांधी जी ॥

अपनी शर्तों पर इरविन तक को भी झुकवा सकते थे ।
भगत सिंह की फांसी दो पल में ही रुकवा सकते थे ॥

मन्दिर में पढ़कर कुरान वो विश्व विजेता बने रहे ।
ऐसा करके मुस्लिम जनमानस के नेता बने रहे ॥

एक नवल गौरव गढ़ने की हिम्मत तो करते बापू ।
मस्जिद में गीता पढ़ने की हिम्मत तो करते बापू ॥

रेलों में हिन्दू काट काट कर भेज रहे पाकिस्तानी ।
टोपी के लिए दुखी थे पर चोटी की एक नहीं मानी ॥

मानों फूलों के प्रति ममता खतम हो गई माली में ।
गांधी जी दंगों में बैठे थे छिपकर नोहाखाली में ॥

तीन दिवस में श्री राम का धीरज संयम टूट गया ।
सौवीं गाली सुन कान्हा का चक्र हाथ से छूट गया ॥

गांधी जी की पाक परस्ती पर भारत लाचार हुआ ।
तब जाकर नाथू उनका वध करने को तैयार हुआ ॥

गये प्रार्थना सभा में गांधी को करने अंतिम प्रणाम ।
ऐसी गोली मारी उनको याद आ गए श्री राम ॥

मूक अहिंसा के कारण भारत का आँचल फट जाता ।
गांधी जीवित होते तो फिर देश दुबारा बंट जाता ॥

थक गए हैं हम प्रखर सत्य की अर्थी को ढोते ढोते ।
कितना अच्छा होता जो नेता जी राष्ट्रपिता होते ॥

नाथू को फाँसी लटकाकर गांधी जो को न्याय मिला ।
और मेरी भारत माँ को बंटवारे का अध्याय मिला ॥

लेकिन जब भी कोई भीष्म कौरव का साथ निभाएगा ।
तब तब कोई अर्जुन रण में उन पर तीर चलाएगा ॥

अगर गोडसे की गोली उतरी न होती सीने में ।
तो हर हिन्दू पढ़ता नमाज फिर मक्का और मदीने में ॥

भारत की बिखरी भूमि अब तलक समाहित नहीं हुई ।
नाथू की रखी अस्थि अब तलक प्रवाहित नहीं हुई ॥

इससे पहले अस्थिकलश को सिंधु की लहरें सींचे ।
पूरा पाक समाहित कर लो भगवा झंडे के नीचें ॥

भीष्मपितामह हो या गांधीजी या जनता संगत दोषी बना ही देता है इसीलिए सावधान रहे! कोई आपके लिए कोशिश कर रहा है साथ नहीं दे सकते तो कम से कम व्यंग बाण तो नहीं चलाइये।

Thursday, 19 May 2016

मंजिल तो तेरी यही थी मुसाफिर सारी उम्र गुजार दी आते आते।

ज्ञान की तलास में स्कूल गया सोचा यहाँ पर मेरी कुछ समस्याएं हल होगी परन्तु जिंदगी का खेल ही कुछ ऐसा है सुलझने के बजाय उलझती गई ये जिंदगी।
बायोलॉजी के टीचर ने सेल मतलब 'शारीर की कोशिकाएँ' बताई। तो फिजिक्स के टीचर ने सेल मतलब 'बैटरी' बता डाला, इकोनॉमिक्स के टीचर से पूछा सेल मतलब  'बिक्री' कहकर कुछ उलझाया, फिर सोचा चलो हिस्ट्री के टीचर से भी मिल लेते है तो उन्होंने सेल मतलब 'जेल' की कोठरी बता डाली, समस्या बढ़ती रही तो अंग्रेजी के टीचर से ज्ञान लिया तो उन्होंने सेल मतलब 'मोबाइल' कहा अब ऐसी उलझी हुई जिन्दगी के सहारे जीने का प्रयास फिर भी मन नहीं करो उदास।

मैंने तो पढ़ाई ही छोड़ दी यह सोचकर कि जिस स्कूल में पांच शिक्षक एकमत नहीं है उस स्कूल में पढ़ कर क्या होगा ? सच्चा ज्ञान मिला जब पत्नि ने बताया सेल मतलब 'डिस्काउंट' होता है।

अब ऐसी शिक्षा के सहारे यदि कोई ब्राह्मणवाद की बात करे तो इसमे आश्चर्य की क्या बात और करना भी चाहिए। परन्तु सोचने का विषय है कि समाज बिना ब्राह्मण का कैसा होगा? आज भी तो जो अध्यापक है, वैज्ञानिक है, धर्म गुरु है, वह ब्राह्मण ही तो है। सैनिकों और सिपाहियों को क्षत्रिय बोलना पड़ेगा, पूँजीपति व्यापारी वैश्य है, और जो नौकरी कर सेवा दे रहा उसे शुद्र कहने में झुंझलाहट क्यों? जब अभी भी ढांचा कुछ इसी तरह है तो क्या ब्राह्मणवाद सिर्फ भय है? अमानवीय तरीके से आरक्षण का अनुचित लाभ लेने वालो के लिए यह एक परेशानी है, ब्राह्मणों ने तो बगैर कुछ सम्पति लालच के व्यवस्था के लिए अपना जीवन व्यतीत किया अगर आज हम सभी के पास ब्राह्मणों जैसा ज्ञान है तो क्यों नहीं कहते कि आरक्षण उसे जो कमजोर हो संसाधनों से, क्यों अमीर लोग इसका लाभ ले बदनाम ब्राह्मण को करते है? समय मिले तो तनिक सोचें जरूर।

हर कोई चाहता है कि सारी दुनियां उसकी तारीफ़ करें पर यह इच्छा अंतिम संस्कार वाले दिन ही पूरी होती है...। ठीक कहता है अस्मशान कि मंजिल तो तेरी यही थी मुसाफिर सारी उम्र गुजार दी आते आते, जिसके लिए तूने सब कुछ लुटा दिया उसी ने जला दिया तुझे जाते जाते। हम अपनी संतानों को बड़ा बनाने की चाह में खुद इतना गिर जाते है कि हमें नैतिकता का आभास भी नहीं होता, संतान परीक्षा पास हो उसके लिये नक़ल भी कराने पहुँच जाते है। लोग नौकरी दिलाने के लिये आरक्षण से भी परहेज नहीं, कितनों ने तो जाली जाति प्रमाणपत्र का भी प्रयोग किया। ऐसी अनैतिकता के सहारे अपनी आत्मा को दूषित करने से क्या हासिल होगा? क्यों भूल जाते है कि पूत सपूत तो क्यों धन संचय? और पूत कपूत तो क्यों धन संचय? हम अनैतिक कार्य करें और बेटे बेटियों से उम्मीद करे कि वे सब राजा हरीशचंद्र बन जाय ऐसा कदापि सम्भव नहीं होगा। एक और बात सोचने की है कि हम अपने पूर्वजो के लिए क्या कर रहे है, उन्हें कितना याद करते है, जब हमें फुरसत नहीं तो हमारी संतानों को फुरसत कैसे होगा? यदि समझ गए तो ठीक है।

मेरे कहने का अर्थ ये नहीं कि हमें माया मोह से मुक्त हो सन्यासी बन जाना चाहिए परन्तु इतना अवश्य है कि जीवन और मृत्यु को, मार्ग का समान्तर चलने वाला दोनों किनारा समझना चाहिए, जहा इन्ही किनारों पर सत्य और माया का निवास है, इन्ही दोनों के बीच हमारा मार्ग होगा तभी लक्ष्य स्पष्ट नजर आएगा। अन्यथा ना मंजिल होगी ना मोक्ष, सफ़र तो सब चलते है मगर डगर का ज्ञान किसी किसी को ही होता है, बाकि तो एक दूसरे को देखकर चलते है, यदि आप को डगर का ज्ञान होगा तो आप औरों की प्रेरणा बन सकते है, परन्तु मात्र ज्ञान से ही कोई किसी के लिए प्रेरणा का पात्र नहीं होता, उसके लिए प्रेम होना जरुरी है, जीवन में किसी का मजाक उड़ाना, किसी असहाय को दुःखी करना, यही हमें नेतृत्व नहीं करने देता, जब प्रेम का ज्ञान होगा तो भक्ति भी होगी और भगवान भी, फिर बगैर सन्यास हम होंगे सन्यासी और लोग अपने आप तारीफ़ करेंगे! हमें तारीफ़ के लिए अंतिम संस्कार का इंतजार नहीं करना होगा कुछ अभी मिलेंगी कुछ तो अस्मशान के लिए उधार छोड़नी होगी, बस इतनी सी जिन्दगी और समस्याएं अनेक है, परन्तु नफरत नहीं तो जीने के मार्ग और जीवन एक है।

जिन्दगी भर सोचता कि ऐसा मत करो वैसा मत करो यहाँ मत जाओ वहा मत जाओ वर्ना लोग क्या कहेगें? 

ता उम्र गुजार दी हमने बस इज्जत बनाते बनाते,

लुट गए मर मिटे बस रस्म रिवाज को निभाते निभाते,

बड़ी देर कर दी ऐ मुसाफ़िर सफ़र में खुद धुनि जगाते जगाते,

जब अज्ञान छटा तो सांसे ही नहीं चलो कुछ तो बोला लुटाते लुटाते।

मगर तनिक भी एहसास नहीं था कि लोग जब बोलेंगे तो बस इतना ही बोलेंगे कि "राम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है।" मैं भी क्या करता जब सुनने और समझने लायक ही नहीं रहा।


Monday, 16 May 2016

सभी को ख़ुशी मिले! सब प्रगति करें! इस लेख का साधारण सा यही लक्ष्य है।

भीख में मिले साम्राज्य से अधिक प्रिय और स्वाभिमानयुक्त मेहनत से कमाई रोटी का मात्र एक टुकड़ा होता है।

पहचान से मिला काम और काम से मिला पहचान में अन्तर, मेहनत की कमाई करनेवाला ही समझ सकता है।

ठीक उसी तरह कांग्रेस सरकार के बाद  मोदी सरकार से आये अच्छे दिन सिर्फ स्वाभिमानी और मेहनतकस ही महसूस कर सकता है।

आप अपने घर का ध्यान आप न रखें और यदि चोरी हो जाये तो,गाड़ी तेज़ चलाएं और धक्का लग जाये तो,पढाई न करें और फेल हो जायें तो, कौन है इन सारी समस्याओं का जन्म दाता? कभी सोंचने का मौका मिले तो सोचें! अन्यथा भाग्य तो है ही, इस दुनिया में होने वाले हर गलत काम का जिम्मेदार आप नहीं है, भगवान है क्या यही आपका तर्क है?

आजकल लोगों ने एक  फैशन बना लिया है, जो काम नहीं कर सकते, उसके लिए भाग्य या भगवान को दोषी मानते है। यदि आप जिम्मेदारी नहीं लेगे तो इस देश से भ्रष्टाचार नहीं मिटा सकता, महंगाई नहीं रुक सकती क्योंकि भ्रष्टाचार बनाने वाले भी आप है और मिटाने वाले भी आप ही होंगे! भगवान ने सभी को हवा, पानी, धुप, आदि बराबर दिया है,कभी क्या आपने देखा है कि ठण्ड के दिनों में अम्बानी के घर के ऊपर मैं तेज़ धुप हो रहा हो या गर्मी में सिर्फ उन्ही के घर बारिश हो रही है। फिर ईश्वर या भाग्य दोषी कैसे?

भगवान ने सिर्फ ज़मीन बनाई, उसे बेचा मनुष्य ने, पानी बनाया, उसे बोतलों मे भरकर बेचा मनुष्य ने,जानवर बनाये, उन्हें मवेशी कहकर बेचा मनुष्य ने, पेड़ बनाया, उन्हें लकड़ी कहकर बेचा मनुष्य ने, क्या किसी भी वास्तु की खरीद बेच ईश्वर करता है? फिर समस्याओं का जन्म दाता वो कैसे हो सकता है? और सबसे मजे की बात कि, ऐसा कोई भी नहीं मिलेगा इस दुनिया में जो समस्या से मुक्त हो, और इस दुनियां में कोई भी ऐसी समस्या नहीं जिसका समाधान न हो, हरवक्त समस्या समस्या कहने या इसी में उलझने से बहानेबाजी आती है, बेहतर होगा कि समाधान के बारे में कदम उठायें! जो आपको नई दिशा और दशा देगा! रास्ते अपनेआप खुलेंगे। ऐ दोस्त जिन्दगी आसान नहीं खुद को मजबूत बनना पड़ता है। समय कभी उत्तम या अनुकूल नहीं होता उत्तम या अनुकूल बनाना पड़ता है। जागों! समय रहते जागों! अन्यथा समय बार बार नहीं आता।

अभी मैं जागो कहूँ और आप जाग जाय ऐसा भी सम्भव नहीं क्योंकि जितनी आसानी से जागो कहा जाता है, उतना आसान ये सबकुछ है नहीं, वर्ना इतने फासले नहीं होते, हर किसी को समझने समझाने और उलझने उलझाने में। प्रकृति भी कुछ ऐसी ही है। क्योंकि हम प्रत्येक वस्तु का एक ही हिस्सा देख पाते है, चाहे वह सिक्का हो, मनुष्य हो, जानवर हो, पेड़, पहाड़, नदी, समुद्र कुछ भी, इसीलिये इतना आसान भी नहीं समस्याओं से समाधान की ओर जाना। यही वजह है, जो आज दुनिया को अमीर गरीब बनाती है। क्योंकि कोई सत्यनिष्ठ सही दृश्य दिखाने की कोशिश करके जैसे ही दूर गया नहीं, कि ठग दूसरा पहलू दिखा तुरंत भ्रमित कर देते है, और लोगों को विश्वास भी उन्ही पर जल्दी हो जाता है क्योंकि वे आसान रास्ता बताते है जो लक्ष्य पर जाता ही नहीं और ठग अमीर ठगा जानेवाला गरीब हो जाता है।

कल्पना कीजिए कि आप किसी बस में सफ़र कर रहे हो और अपने सीट को लेकर परेशान काफी मेहनत कोशिशों के बाद आपको सीट मिल भी जाय आप आराम से बैठकर सोचें कि आपको जाना कहा है और पता चले कि यह बस कही और जा रही है तब कैसा लगेगा? क्या होगा आपकी मेहनत का जिसकी वजह से आपको सीट मिली, ठीक उसी प्रकार पहले मेहनत नहीं करें! सबसे पहले सोचें कुछ भी करने से पहले योजना बनाएं! फिर उस योजना पर अमल करें, अमल करते वक्त भी बार बार सचेत रहे, निरंतर निगरानी करते रहे कि आप जो कर रहे है उसका परिणाम आपको आपके लक्ष्य की ओर ही ले जा रहा है, यदि परिणाम विपरीत हो रहा हो तो वही पर फिर अनुकूल होने की योजना बनाये, और अमल करें, निगरानी करें इस प्रकार निरंतर प्रयास करें सफलता अवश्य मिलेंगी।

फिर भी इतना आसान नहीं ये दुनिया क्योंकि आप जहाँ खड़े है वहा से जो अपने लक्ष्य बनाया वहा तक जाने का मार्ग ही आपको पता नहीं हो! यदि ज्ञात होता तो आज आपके सामने कोई समस्या होती ही नहीं। मैं कोई ज्योतिषी या मनोवैज्ञानिक नहीं जो बोलूँ कि शायद आपके लिए लक्ष्य तक जाने का मार्ग अभी तक बना ही नहीं। हो सकता है नहीं बना हो, यदि नहीं बना तो इसे आप बना सकते है तो बनाएं! अन्यथा एक और तरीका है कि कोई और बनाये, उसके लिए जरुरी है कि आप सही सरकार चुने! क्योंकि प्रजातंत्र में सरकार की मुख्य भूमिका होती है, एक गलत चुनी हुई सरकार बेरोजगार व्यक्तियों को दस वर्ष पीछे धकेल देती है। और सरकार चुने कैसे यह भी एक समस्या है। क्योंकि भविष्य में कौन धोखेबाज़ होगा यह कहना भी आसान नहीं, परन्तु यह एक घटना पढ़ें!

एक बार एक मैदान में खेल रहे कुछ बच्चों के पास एक मनोवैज्ञानिक गया, और सोचा बच्चों की रेस लगवाकर मजा लेता हूँ। दो चार मिठाई खर्च करके! सभी बच्चों को अपने पास बुलाया और एक मिठाई का बॉक्स एक पेड़ की नीचे रखकर बोला। जो बच्चा सबसे पहले दौड़कर बॉक्स को छुएगा उसे पुरे बॉक्स की मिठाई मैं दे दूँगा। सभी ने बोला ठीक है, अब उस व्यक्ति ने एक दो तीन कहकर बोला लेलो मिठाई का बॉक्स। पता है क्या हुआ? सभी बच्चों ने एक दूसरे का हाथ पकड़कर दौड़ लगाई, और एक साथ बॉक्स की सारी मिठाइयां अपने आप हासिल कर ली मनोवैज्ञानिक की सारी योजना फेल हो गई क्योंकि एकता की शक्ति सिर्फ लक्ष्य देती है निराशा नहीं। यदि मनोवैज्ञानिक बेईमानी करता तो। सारे बच्चे दूसरा भी तरीका अपना सकते थे। हम है लड़ते है जाति के नाम पर सोंचते है हमें आरक्षण का लाभ मिल रहा है परेशान तो ओ है। जिसका लाभ उठाकर नेता मजे कर रहा है और आप समस्याओं का पहाड़ लिए रास्ता वीहीन मूक दर्शक। दूसरों का अहित और अपना हित जिस दिन लोग देखना बंद कर देगे उसी दिन से बेरोजगारी बेईमानी भ्रस्टाचार अत्याचार सबकुछ समाप्त हो जायेगा।

Thursday, 12 May 2016

जिसे 2002 गुजरात दंगो के विवाद में ना फंसा पाएं उसे डिग्री विवाद में घेरने वाले मुर्ख नहीं तो क्या?

आजादी के बाद से ही कांग्रेस या कांग्रेस विचारधारा के लोगों ने देश पर राज किया। 17 सालों तक नेहरू जी, 15 साल इंदिरा जी 5 साल राजीव जी 5 साल पी वी नरसिम्हाराव जी 10 साल तक श्रीमती सोनिया जी बाकि के लगभग 5 साल साल तक कांग्रेस की विचारधारा वाले चौधरी चरण सिंह, देवगौड़ा,गुजराल और चंद्रशेखर आदि। इतने लंबे समय से विपक्ष में नहीं रहने से इनमें सत्ता का सुख में अंधापन, ज्ञानहीनता, संवेदनहीनता और अनुभवहीनता स्पष्ट नजर आती है। अब जब जनता ने विपक्ष के लायक भी नहीं छोड़ा तो तिलमिलाहट होना स्वाभाविक है,मगर झुंझलाहट का अर्थ ये नहीं कि पप्पूगीरी चालू कर दी जाय विपक्ष अनुभवहीन है तो सीखना चाहिए अन्यथा सत्ता में वापसी क्या जनता में वापसी के लाले पड़ सकते है। कुछ विपक्ष के कारनामें गिनाता हूँ।

कांग्रेस के पुराने मझें हुए नेता बाबू दिग्विजय सिंह की भी मूर्खता विपक्ष के काम न आ सकी। कहते है इंसान अपने चाल चरित्र व्यवहार ज्ञान विज्ञान तर्क आदि के आधार पर ही बातें करता है बाबू दिग्विजय सिंह ने भी कुछ ऐसा ही किया। दिग्विजय सिंह चाची के प्यार में अंधे हो चुके थे उन्हें बहु बेटे नात समाज का कोई लोक लाज नहीं था। ऐसा व्यक्ति जब किसी लड़की के प्यार में फसता है तो सेक्स का भूत ही ऐसा होता है जिसके पास सात खूटे होते है, फंसते ही दो कान में, दो आँख में, दो नाक में ठूस देता है। फिर तो न दिखाई देगा न सुनाई देगा सब तो सब गन्दगी भी महसूस नहीं होगी सब में ख़ुसबु ही आएंगी। परन्तु जब सेक्स का भूत हटता है तो जाते जाते जो एक खूँटा बचा था वह कहा ठोकता है ये बताने की जरुरत नहीं लोग खुद ही समझदार है। उन दिनों कुछ ऐसे है हालात थे बाबू दिग्विजय सिंह के इसलिए इन्होंने मोदी जी की पत्नी का मुद्दा उठाया और हासिल क्या हुआ उल्टे इस मुद्दे से मोदी जी की सराहना ही हुई लोगों ने मोदी जी को त्यागी सन्यासी देश को पूरा जीवन समर्पित आदि समझने लगे। यहाँ भी विपक्ष को मुकी खानी पड़ी।

सोनिया जी के सपूत बचपन से ही बड़े लाड़ प्यार में पले बढ़े है, कभी दुःख देखना तो दूर दुःख किताबों में भी नहीं पढ़ा, जो कुछ भी चमचों ने दिखाया जैसे किसी कुटिया में खाना खिलाया, कही पर मिट्टी फिंकवाया, किसी का पैर छुववाया आदि। राहुल जी इसे ही गरीबी और देश की समस्या मान बैठे। एक तरफ अमीरी की पलँग दूसरी तरफ चमचों द्वारा दिखाई गई गरीबी की चादर, इसके सिवा जैसे देश में और कोई समस्या है ही नहीं, और भगवान ने शायद ज्ञान भी नहीं दिया कि परख सके कि ये गरीबी आखिर है क्यों? क्या वजह है कि आजादी के 70 सालों के बाद भी हर कोई आरक्षण की चाहत में जी रहा है। खैर इन सब अनुभवों के बीच राहुल जी का सवाल कि मोदी जी लाखों का सूट पहनते है स्वाभाविक है क्योंकि राहुल ने तो सूट देखें है, या फटी हुई चादर, बीच का सारा हिस्सा तो नदारत है, तो ज्ञान होगा कैसे? उन्हें ये भी ख्याल नहीं कि उनके पूर्वजो का सूट विदेशों से धुलकर आता था, कॉलेज में जितने गेट होते थे उतनी गाड़िया खड़ी होती थी, नेहरू जी को पिकअप करने के लिए। भूल गए कि प्रधानमंत्री की कुछ मर्यादाएं होती है, जिसे विदेशों में मुफ़्त लुटाया नहीं जा सकता। सवा सौ करोड़ का प्रतिनिधित्व करनेवाला जब साठ करोड़ के प्रतिनिधित्व करनेवाले से मिलेगा तो इस बात का ख्याल होना स्वाभाविक है, वर्ना भारत को भिखारी बनाने वालों का ख़्वाब तो पूरा होता नजर आएगा! जिसे मोदी जी ने होने नहीं दिया और देश के गौरव की खातिर एक साधारण से सन्यासी ने लाखों का सूट धारण किया, और भारत के स्वाभिमान को चार चाँद लगाया। यह भी कांग्रेस का दाव उल्टा पड़ा, पढ़े लिखे बुद्धजीवियों के बीच! और लोगों ने मान लिया बचवा अभी नादान है, भगवान ज्ञान दे!

राहुल तो नादान है बच्चा है लेकिन मणिशंकर अय्यर तो खेले खाये पुराने कांग्रेसी है इनमें तो थोड़ी बुद्धि होनी चाहिए! परन्तु क्या करेंगे कहा है विनाश काले विपरीत बुद्धि! कोई मुद्दा नहीं मिला तो बोले चाय बेचने वाले को प्रधानमंत्री नहीं बनने दूँगा। मोदी चाहे तो कांग्रेस के दफ़्तर के बाहर चाय बेच सकते है। ये वही मणिशंकर है। हाँ हाँ वही जो पाकिस्तान में जाकर बोले कि "मुझे पाकिस्तान सबसे प्रिय देश लगता है। मैं चाहता हूँ कि पाकिस्तान और भारत की मित्रता आगे बढ़े इसके लिए भारत हर कीमत चुकाने को तैयार है। कश्मीर तो एक छोटी समस्या है, ये तो पलक झपकते हल हो जाएंगी, बस मुझे सत्ता में आने के लिए आप लोग मुझे मदत दे!" अब यदि ऐसा व्यक्ति जो सत्ता के लिए पाकिस्तान से मदद मांग सकता है, उसकी औकात का अंदाजा आप तो लगा ही सकते है, कि समय आने पर वह क्या गुल खिलायेगा। खैर इतने गिरे लोग भारत में पैदा ही कैसे हो जाते है यह भी सोचने का विषय है, परन्तु इतने दिनों तक कांग्रेस के शासन ने ऐसे ही लोगों को प्राथमिकता दी गई, यह बात तो प्रमाणित होती है।

इन पुराने नेताओं के बीच नए नेता दिल्ली के सी एम केजरीवाल से लोगों ने बड़ी उम्मीदें बाँध रखी थी कि ये नया है कुछ न कुछ नया करेगा। वैसे तो पढ़े लिखे लोगों ने समझ लिया था कि ये बेवकूफ बना रहा है जनता को क्योंकि इसने जब अन्ना जी की बातें नहीं सुनी तो जनता की क्या खाक सुनेगा? फिर भी जनता तो जनता होती है लोगो ने जो निर्णय किया शायद वह समयोचित भी था अगर ये केजरीवाल जनता को धोखा नहीं देता तो। जो मुद्दे इसे उठाने चाहिए थे जैसे भ्रस्टाचार मुक्त भारत, स्वराज, आदर्श व्यवस्था, बेरोजगारी, अशिक्षा आदि वे मुद्दे सरकार उठा रही है या सरकार को समर्थन देने वाले लोग। ये तो कभी मोदी जी हर घंटे कुर्ता बदलते है, कभी इतना विदेश यात्रा क्यों करते है, कभी मोदी जी की डिग्री फर्जी है आदि आदि। लोगों ने सोचा था ये पढ़ा लिखा है,समझदार है, ईमानदार है अनशन करके इसने परिश्रम और जनून लगन का भी परिचय दिया है। तो भविष्य में अच्छा ही करेगा। मगर पप्पू तो पप्पू ये तो उसका पप्पा निकला। अब बात ये है कि इन चोचले बाजी वाली बातों से मनोरंजन तो हो सकता है, मगर लोगों के पेट नहीं भर सकते, देश को प्रगति नहीं मिल सकती, भारत कभी विष्व पटल पर अपना वर्चस्व कायम नहीं रख सकता। ऐसे में मोदी सरकार और समर्थकों का उत्तरदायित्व और भी बढ़ जाता है जब विपक्ष दिशाहीन अनुभवहीन विवेकहीन हो चूका हो।

दिशाहीनता के बीच कुछ शातिर लुटेरों ने समझ लिया है कि मोदी सरकार को सत्य मार्ग पर चलकर लताड़ा नहीं जा सकता। ईमानदारी पर चुनौती नहीं दिया जा सकता। परिश्रम लगन जनून तो जनता देख ही रही है। अब देश की किस नेता को पड़ी है सबको तो अपनी अपनी कुर्सी चाहिए! फिर एक ही रास्ता बचता है कि कुनबा जोड़ा जाय। इन दिनों खूब चर्चा है बिहार में मिली बीजेपी की हार का, लुटेरों के बीच आशा जगी है कि कुनबा जोड़ कर मोदी को सत्य मार्ग से बिचलित किया जा सकता है। इसीलिए पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट और कांग्रेस एक हुए और आने वाले दिनों में ऐसे प्रयोग और अधिक मिलेंगे मगर अब जनता को सोचना है कि कुनबा चाहिए या अपनी बंसजो का स्वाभिमान सम्मान और भविष्य आदि।

       जय हिन्द!

Wednesday, 11 May 2016

नितीश कुमार का बड़बोलापन और लंबी लंबी ख्वाइसों के बीच फंसा बिहार,

नितीश कुमार का बड़बोलापन और लंबी लंबी ख्वाइसों के बीच फंसा बिहार, जनता को तो कबीरदास जी के ये दोहे याद आ रहे है कि "करता रहा सो क्यों किया अब काहे पछताय। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाय।।" और जनाब है कि ख़्वाब पाल बैठे है संघ मुक्त भारत का। अब इनको कौन समझाए कि ऐसा ख़्वाब उस समय क्यों नहीं आया जब संघ की शरण में रहकर दस वर्षो तक बिहार की गद्दी संभाली और ख्याति लूटी, वैसे संघ का कार्य ही है व्यक्तित्व निर्माण करना शासन करना नहीं। संघ ने व्यक्तित्व बनाया अब कोई गद्दार निकल गया तो उसमें संघ का क्या दोष? युग तो ऐसा चल रहा है कि समय यदि ख़राब हो तो बाप की कहनी बेटा भी ठुकरा देता है और नितीश बाबू आप तो एक नेता मात्र ही है आपकी क्या औकात की सत्य मार्ग पर सदा बने रह पाएं।

संघ मिटाने का ख़्वाब बहुतों ने देखा 1923 में संघ का मज़ाक भी बनाया परन्तु मिट गए मिटाने वाले, सोचा नहीं देश हित लूटते रहे गरीबों की रोटियां, जब खुद खड़े हो गए मिटने की कगार पर तो अब ऐसा ही दर्द थोप दिया है नितीश जी आप के हवाले। नेहरू से लेकर राहुल तक ने कोशिश कर ली अब आप ने भी लँगोट संभाली ही है तो कोशिश में क्या जाता है।

आये दिन बिहार में बढ़ते अपराध चीख चीख कर बददुआएं दे रही है, मगर कुर्सी का अहंकार ही ऐसा होता है कि कान तक आवाज पहुचती ही नहीं। ऐसा ही भ्रम कभी बाली को भी हुआ था, जिसने अपने छोटे भाई की पत्नी को भी अपनी पत्नी की तरह रखा था, मात्र इस बहम में कि वह सर्वश्रेष्ठ योद्धा है। उसे कोई नहीं मार सकता, क्यों नहीं मानी ये बात सुग्रीव ने? सुग्रीव ने अपनी जान बचा गुफ़ा के दरवाज़े से वापस किसकिन्धा क्यों आ गया? यही गरूर लिए बाली ने अत्याचार किया। लेकिन परिणाम क्या हुआ जब श्री राम के मात्र एक बाण ने जमीदोज कर दिया तब नीतियां और धर्म याद आने लगा। वैसे तो सब भूल गया था नितीश बाबू बिल्कुल आप जैसा ही। याद है उसने क्या बोला। बोला कि "मैं बैरी सुग्रीव पियारा, अवगुन कौन नाथ मोहि मारा।" ऐसा सुनने पर लोगों के अनेकों तर्क सामने आने लगते है कोई बोलता है श्री राम ने छुप कर मारा यह उचित नहीं था तो कोई कहता है श्री राम ने अपने फायदे के लिए मारा। परन्तु श्री राम जी के उत्तर ने जब बाली को संतुष्ट किया तो हम आप न तो राजा है और न न्यायाधीश फिर भी तर्क कुतर्क ऐसा करते है जैसे असंतुष्ट बाली ने पहले किया था।

कभी कभार लोग ये भी बोलते है कि बाली एक पशु योनि का प्राणी था उसपर मनुष्य के नियम निति क्यों? मगर हम ये भूल जाते है कि निति और नियम की बात पहले बाली ने ही की थी, यदि कोई भी जीव निति या नियम की बात अपने स्वार्थ के लिए तो करता है परन्तु जब वही निति या नियम उसे जकड़ने लगते है तब पतली गली पकड़ भाग लेता है। सत्य अच्छा तो सबको लगता है मगर जब सत्य सामने परोसा जाता है तो किसी को भी अच्छा नहीं लगता। वैसे भी जीव बुद्धि से ही मनुष्य होता है। बाली बुद्धिमान नीतिवान और कुशल धर्मनिष्ठ प्राणी था कुछ अहंकार ही उसे धर्म से दूर कर गए वर्ना आज के मनुष्यों से श्रेष्ठ ही था। ऐसे बुद्धिमान जीव की योनि भले ही पशु हो परन्तु उसके सारे व्यवहार और निति मनुष्य जैसी ही होती है, और बुद्धिहीन मनुष्य की योनि भले ही मनुष्य की हो परन्तु वह पशु की भाँति होता है।

नितीश जी भी आजकल सत्ता मद में चूर जनता के दुःख दर्द से परे बस इनदिनों प्रधानमंत्री के ख्वाबो में डूबे हुए है जिन्हें नैतिकता से कोई लेना देना नहीं बस कुनबा जोड़ने में ज्यादा वक्त गुजार रहे है उन्हें बाली की वीरता और दुर्दशा का ज्ञान भी नहीं, बाली के कर्म कुछ अच्छे थे जो श्री राम ने अदृश्य होकर मारा परन्तु मरते वक्त दर्शन देकर धन्य कर दिया। जनम जनम मुनि जतन कराही, अंत राम कही आवत नाही। और बाली के सामने साक्षात प्रभु खड़े थे, लेकिन नितीश जी आप का क्या होगा? जिसे जनता का दर्द नहीं दिख रहा है। आप कम से कम उन्हें भी याद कर लीजिये जिन्हें जनता ने विपक्ष लायक भी नहीं छोड़ा एक समय उन्हें भी अहम् आपसे कम नहीं था।

सर उठाकर जहाँ देखो वही नजर आते है भोलेबाबा।।

हमें याद है स्वामी विवेकानंद और सुभास चंद्र बोस।
गर्व होता नहीं दलाल गद्दारों से और न आता है जोश।।
यह देश कभी भी नहीं गर्व करता मुल्लो या काजी से।
इस देश के लोगों में जोश आता है वीर  शिवाजी से।।
यह देश दिल से पूजता नहीं किसी अली या वली को।
बच्चा बच्चा अपने दिलोँ में रखता है बजरंग  बली को।
यह देश नहीं करता फकिरो या पीरो को कभी सलाम।
यह देश सीखता है जब शिक्षा देते है अब्दुल कलाम।।
पढते है उन्हें समझने के लिए हम बाईबल और  कुरान।
मगर अपने दिल में रखते है सर्वश्रेष्ठ गीता और पुराण।।
इस देश में कही भी नहीं टिकते है अल्लाह या काबा।
सर उठाकर जहाँ देखो वही नजर आते है भोलेबाबा।।