Sunday, 26 June 2016

नशा शराब में होती तो नाचती बोतल, नशा यदि लालच बन जाए तो जिंदगी होटल।

नशा शराब में होती तो नाचती बोतल, नशा यदि लालच बन जाए तो जिंदगी होटल।
          एक नाइ अपने परिवार सहित खुशहाल जिंदगी जी रहा था, उसके परिवार में दो बच्चे भी थे, नाइ सदैव बड़े बूढ़ो को भगवान की तरह सम्मान देता था। न किसी से तकरार न किसी से रार सबके साथ हँसी ख़ुशी बातें करना, उसकी जिंदगी की खासियत थी। दरवाजे पर आये अतिथि को कभी एहसास ही नहीं होने देता था कि अतिथि अपने घर से दूर है।

नाइ अपनी जीविका चलाने के लिए रोज राजा की हजामत करने जाता था वहा से उसे रोज 100 मुद्राएं मिलती थी उसी से वह दान पूण्य घर गृहस्थी नात रिस्तेदार पास पड़ोस बीबी बच्चों सब को खुश रखता था और स्वगं भी खुश रहता था। नाइ के अंदर तनिक भी लालच नाम की चीज नहीं थी जब कोई उसे कुछ देने की चेष्टा भी करता तो हँस कर बोलता था बाबू सब कुछ आपका ही तो है। आप मेरी ये अमानत अपने पास रखिये समय आने पर मैं ले जाऊँगा। गांव के लोग एक आवाज लगाये नहीं कि नाइ सेवा के लिए हाजिर रहता था, गांव में सबकी हजामत बिना कुछ लिए करता रहता था, फिर भी खुशहाल इतना मानो साक्षात लक्षमी का निवास हो नाइ के घर में। नाइ की ईमानदारी, सेवाधर्म, माया मोह मुक्त, खुशहाली, बड़प्पन आदि की चर्चाए दूर दूर तक होने लगी।

एक दिन नाइ के घर एक ब्राह्मण आया ब्राह्मण ने भी वही देखा जो कभी कही सुना था, तो ब्राह्मण ने नाइ से कहा भाई मेरे पास कोई संतान नहीं है और ये मेरे पास तीन मुद्राओं से भरे घड़े है आप इसे लेलो, क्योंकि अब हमारी उम्र मात्र दो दिन बची है एक दिन में मैं काशी पहुँच जाऊँगा दूसरे दिन मेरी मौत हो जायेगी वहा कोई न कोई दाह संस्कार कर ही देगा, नाइ ने कहा महाराज दाह संस्कार कोई नहीं मैं आपके साथ चलुंगा और करूँगा आपने मुझे भाई कहा तो भाई को अपना फर्ज निभाने दीजिए! मगर हमारी आपसे एक विनती है कि ये मुद्राए काशी लिये चलते है वही जरुरत मंदो में बाट देंगे। ब्राह्मण ने कहा हमारी तो उम्र हो चुकी है और ये मुद्राए हमने आपको इसीलिए दी कि इससमय इसकी आपको जरूरत है, क्योंकि हो सकता है कल राजा अपनी हजामत के लिए किसी और नाइ को रख ले, फिर तो आपको ये मुद्राए काम आएगी। नाइ ने कहा महाराज होने को तो बहुत कुछ हो सकता है मगर अभी मुझे इसकी जरूरत नहीं है, आप मुझसे बड़े और पूज्य है इसलिए आपकी दी हुई मुद्राओ को मैं स्वीकार करता हूँ और आपके ही हित में खर्च करना चाहता हूँ ताकि अगले जन्म में ये आपको वापस मिलें। ब्राह्मण ने कहा भाई ये तो हमें अगले जनम में तो मिलेंगी ही क्योंकि मैंने इसे जो आपको देदी है। यदि आप यह सोचकर दान देना चाहते हो कि इससे मेंरा भला होगा तो वह हो चुका क्योंकि आपने इसे स्वीकार लिया है, अब आप अपने लिए इसे खर्च करें भविष्य में ये आप को काम आएंगी। नाइ मान गया और ब्राह्मण देवता अपनी योजनानुसार चल बसे।

जब नाइ ब्राह्मण देवता का दाह संस्कार करने गया था उसी बीच नाइ के दो भाई शिवपाल और रामगोपाल घर पर आ गए, उनलोगों ने अपने भाई के बारे में भाभी से पूछा तो भाभी ने सबकुछ सच सच बता दिया, और यह भी बता दिया कि आपके भाई साहेब आते ही ये सारी मुद्राओं से हवन यज्ञ दान पूण्य और ब्राह्मणों को भोजन आदि कराएंगे जब तक ये मुद्राएं ख़त्म नहीं हो जाती। इतना सुनते ही दोनों भाइयों के तो होस ही उड़ गए, जैसे समुद्र में रहकर प्यास गजब की लगी हो और पानी पी नहीं सकते। अब शिवपाल तो पक्का बुड़बक था मगर शातिर ऐसा जैसे कालनेमी श्री हनुमान को रोकने की योजना बना रहा हो, मगर रामगोपाल ने बुद्धि लगाई और भाभी को बच्चों का भविष्य दिखा डेढ़ घड़ा अपना हक़ अलग कराने की युक्ति लगाई। अब बच्चों सहित भाभी और दोनों भाई नाइ का इंतजार कर ही रहे थे कि नाइ महोदय आ टपके। आते ही बीबी भुन भुन करने लगी, जब देखो दिन रात दुसरो की सेवा में लगे रहते है, जैसे इनके पास बीबी बच्चे नहीं है, कल कुं अक्लेशवा बड़ा होगा उसके बारे में कुछ सोचा समझा है आप को तो राजा साहेब के यहाँ हजामत करने की नौकरी मिल गई है, कल राजा साहेब भी नहीं रहे तब क्या होगा? चल चल ज्यादा दिमाग मत लगा भगवान है वही सबका भला करेंगे! बीबी तो आग बबूला बोली आप अपना भला भगवान से करवाओ मुझे नहीं करवाना ये भला वला, ऐसा करो आप अपने हिस्से का डेढ़ घड़ा ले जाओ चाहे ब्राह्मण खिलाओ चाहे कुत्ता मगर मेरे हिस्से के घड़े को हाथ नहीं लगाए वर्ना मैं अपने बच्चों सहित अलग हो जाउंगी। फिर भी नाइ नहीं माना बोला तुझे अलग होना है अलग हो जा घड़ा लेना है घड़ा लेजा मेरे हिस्से जो भी आएगा मैं उसे ही दान करूँगा। अब शिवपाल ने बुद्धि लगाई, बोले भाभी डेढ़ घड़ा आप लेलो और डेढ़ घड़े के साथ हम पुरे परिवार सहित भइया का साथ देंगे परोपकार के कार्यो में। नाइ की हालात और लाचारी देख नाइ के चाहनेवालों ने भाभी की बड़ी बेइज्जती की मगर भाभी को मोह जो छाप लिया था और भाभीजी ने अलग होने का निर्णय ले ही लिया।

अब सभी लोगों के सामने एक एक घड़ा बाट दिया गया बाकि बचे तीसरे घड़े को बाटने के लिए एक और घड़ा मंगाकर उसे आधे आधे कर बाटा गया। डेढ़ घड़ा मिलते ही नाइ को उन तीन घड़ो की याद आने लगी जो ब्राह्मण ने दिया था, उसे यह बात सताने लगी कि उसके पास तीन घड़े थे अब डेढ़ ही बचे, फिर तो क्या नाइ दिन रात मेहनत कर उसे तीन बनाने में लग गया। कठिन मेहनत की वजह से नाइ का स्वभाव भी चिडचिढ़ा होने लगा, उसे अपने परिवार के सिवा दुसरो पर विश्वास भी नहीं रहा वह दिनप्रति दिन डिप्रेशन में हो गया। अब स्वभाव बदलने की वजह से राजा के साथ भी व्यवहार उचित नहीं करता था कभी हजामत करते समय ऐसी बहकी बहकी बातें करता था कि राजा को भी क्रोध आ जाय, काफी कुछ राजा ने समझाया मगर नाइ की लालच बढ़ती ही जा रही थी, और घड़ा था कि डेढ़ से दो होने का नाम ही नहीं ले रहा था। एक दिन नाइ की बीबी राजा के यहाँ गई और हजामत के लिये खुद नौकरी मांगी। राजा भी नाइ से परेशान था सोचा चलो इसे भी रख लेते है। अगले दिन नाइ ने देखा कि उसकी बीबी भी राजा की सेवा में लगी हुई है तो नाइ को गुस्सा आया और वह नौकरी छोड़छाड़ चल दिया।

बीबी भी दिनरात मेहनत कर घड़े को भरने में लगा रही थी जिसकी वजह से उसके अंदर लालच का रावण बढ़ता जा रहा था मगर न नाइ का घड़ा दो हुआ और न बीबी का, दोनों की खुशहाल जिंदगी में लालच ने ऐसा घर बनाया कि बच्चे आवारा हो गए उसके भाई बंधू शराबी कबाबी अय्यास। आये दिन रोज गुंडा गर्दी करते लूट घोटाला चोरी ठगी सारे हथकंडे अपना लिए बीबी और नाइ सहित उसके सारे बाल बच्चे और नात रिश्तेदार भाई बंधू जाति बिरादरी के लोग मगर किसी का भी घड़ा डेढ़ से दो नहीं हुआ।

एक दिन नाइ की बीबी से राजा ने पूछा कि बात क्या है जो तुम लोग इतना परेशान हो। नाइन पहले तो हिल्ला हवाली कर रही थी मगर राजा के बहला फुसला कर पूछने पर राजा को घड़े वाली बात बता ही दी फिर तो क्या राजा को सब समझ में आ गया क्योंकि राजा एक संत तपस्वी व्यक्ति था। फिर तो राजा ने नाइ को भी बुलवाया और दोनों को समझाया कि ये डेढ़ का मतलब अधूरी जिंदगी, अकेले तुम हँस तो सकते हो मगर जश्न नहीं मना सकते, जिंदगी जी तो सकते हो मगर महफिल नहीं सजा सकते। लालच माया छोड़ो दोनों फिर से एक हो जाओ और ख़ुशी ख़ुशी अपनी जिंदगी बिताओ। घड़े डेढ़ है उन्हें तीन बनाओ और जिंदगी में फिर से वापस आओ अन्यथा ये लालच जो है खुद तो डूबेगी ही साथ ही साथ अपने कुल खानदान भाई बिरादर नात रिश्तेदार सबको ले डूबेगी। मगर राजा की बात दोनों को तभी तक याद रही जब तक राजा बोल रहा था। आज भी दोनों नौकरी कर रहे है बच्चे दाइयों के हाथ पल बढ़ रहे है, नौकरों ने खाना बनाया तो खाया वर्ना होटलों का रुख कर रहे है मगर घड़ा है कि डेढ़ से दो होता नजर नहीं आता इन्हें कौन समझाये कि भाई लालच छोड़ो घड़ा दो नहीं तीन हो जायेगा अपने आप तीन का मतलब मियां बीबी और बच्चे।

हालात कुछ ऐसे ही है यूपी में माया और मुलायम के साथ ही साथ उनके चाहने वालों के। ये दो ही पार्टियां ऐसी है जो यूपी वालों के घड़े डेढ़ से तीन नहीं होने दे रही है समय रहते जाग जाओ वर्ना समय जब सुलायेगा तो जागने का अवसर फिर नहीं आएगा।

Wednesday, 22 June 2016

कर्म पर मनुष्य का अधिकार है और फल परिस्थितियों पर आधारित है इसका मतलब परिस्थियां ही भाग्य है?

भरोसा ऊपरवाले पर,तो जो लिखा है तक़दीर मैं वही पाओगे।
मगर, भरोसा ख़ुद पर है तो वही मिलेगा जो आप चाहोगे !!

पानी को चाहे कितना भी उबालो मगर समय आने पर वह ठंडा ही हो जाता है, वैसे ही किसी भी मनुष्य पर उपदेश का प्रभाव होता है उपदेसक के हटते ही बात जस की तस।
मगर दुःखी ना हो! कर्म पर मनुष्य का अधिकार है और फल परिस्थितियों पर आधारित है, इसका मतलब परिस्थियां ही भाग्य है। नहीं माना कि परिस्थितियों की वजह से मनुष्य को कर्म के अनुसार, जो वह चाहता है वह नहीं मिलता, मगर ये भी तो हो सकता है कि मनुष्य जितना करता है, उससे अधिक फल की कामना करता हो, और करे भी क्यों नहीं, जब वह देखता है कि, कोई वही कर्म करके जो फल प्राप्त कर लेता है तो दूसरे को क्यों नहीं मिलता? चाहत गलत आपके अनुसार नहीं, मगर प्रकृति के अनुसार है।

सबसे पहले विचार करने योग्य बात है कि परिस्थितियां है क्या? माना लोगों को दिल्ली जाना है,कोई गुरुग्राम में है, कोई गाज़ियाब, तो कोई मुम्बई आदि। किसी के पास फ्लाइट का शाधन, किसी के पास कार का तो कोई पैदल, अब समझने की बात ये है कि कौन कहाँ है, उसके पास शाधन क्या है, वह चलता कब है,और आगे चलकर कैसे मार्ग मिलते है, कैसा ट्रैफिक होगा और संशाधन अंत तक साथ देगे या नहीं आदि आदि। बस इसी तरह परिस्थितियों का समझा जा सकता है, मगर इनपर विजय कैसे पाया जाय, इसके लिए कुछ निम्न बातों को विचार करना होगा।

सबसे पहले अपने संशाधन का सामर्थ्य समझे! उस संशाधन से कितने समय में पहुँच सकते है, कब पहुचना है, उसके अनुसार चलने का समय तय करें! मगर हो सकता है रास्ते में आपका संशाधन ख़राब हो जाय, फिर तो महत्वपूर्ण ये ये है कि आपको पहुचना कितना मूल्यवान है, उस मूल्य के आधार पर पहले से ही मान कर चलें कि संशाधन ख़राब होने पर दूसरा विकल्प उपलब्ध हो, जिससे आपका समय न बर्बाद हो, और पहुचना जितना महत्वपूर्ण हो उतना विकल्प लेकर चलें। सभी आने वाली बाधाओं पर गंभीरता से विचार करें और सभी बाधाओं का विकल्प चुनें! फिर भी परिणाम पर आपका अधिकार नहीं है।  कुछ हद तक आप परिणाम के नजदीक हो सकते है, मगर अधिकार कर पाना इतना कठिन है जितना मनुष्य के पास विकल्प नहीं है।

जब विकल्प का अभाव होता है तभी हमें भाग्य पर विचार करना होता है, अन्यथा परिणाम की लागत इतनी अधिक हो जायेगी कि परिणाम महत्वहीन हो जायेगा। फिर दिल में ख्याल उठना ही चाहिए कि फल मनुष्य के अधिकार की बात नहीं, मगर एक बात है कुछ लोग बिना कर्म के भी परिणाम पा जाते है, क्योंकि परिस्थितिया जो दूसरे मनुष्य द्वारा, प्रकृति के द्वारा या खुद के द्वारा जो पैदा की जाती है, वही कई बार हमें अनचाहा परिणाम दे जाती है, जिसे हम समझ नहीं पाते और भाग्य मान लेते है, और मानना ही पड़ेगा क्योंकि हम कभी भी संपूर्ण ब्रह्माण्ड की परिस्थितियों को अपने बस में नहीं कर सकते! ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियों पर प्रत्येक मनुष्य का अधिकार है तो निश्चय ही आपका भी है मगर सारी शक्तियां आपके लिए कार्य करें ऐसा न किसी के लिए हुआ है और न होगा चाहे खुद ब्रह्मा ही क्यों न अवतरण ले लें। मगर ये न भूलें कि, एक बार चन्द्रगुप्त ने कहा आचार्य चाणक्य से, जो भाग्य में लिखा होगा वह तो मिलेगा ही, तो चाणक्य ने कहा, क्या पता भाग्य में लिखा हो कि कर्म करने से ही मिलेगा, तो कर्म तो करना ही होगा।

कर्म करें परन्तु जैसा कि आजकल के राजनेताओं के कर्म है वैसा नहीं, उतना अधिक विकल्प पर विचार करना अधिक से अधिक विकल्प को साथ रखना कि फल अवश्य मिले! सदैव मनुष्य को अधर्म के मार्ग पर ले जाता है। नेताओं जैसी सोच कि सत्ता चाहिए ही! यही अधर्म है। जब फल की कामना के लिए मनुष्य आतुर हो जाता है, तो यही अधर्म है। जिसके लिए भाग्य पर भरोसा करना ही धर्म है, वर्ना परिस्थितियों को मनुष्य इतना जटिल कर देगा कि विनाश के सिवा कुछ नहीं बचेगा। आज हम उसी दिशा में प्रयासरत है, हमारे नेता अनेकों रूप से विचार कर सभी विकल्पों को साथ लेकर चलने का प्रयास कर रहे है, जैसे जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद, भाईभतीजावाद, अलगाववाद विकासवाद,भ्रस्टाचार,गरीबी,रोजगार,शिक्षा इतने से भी काम न चले तो सब्सिडी और मुफ़्त सामग्री और शाधन का लालच आदि आदि, मगर भाग्य को भुलाने की वजह है कि आज की राजनीति गन्दगी से भरी पड़ी है, मेरी कामना यही है कर्म करें और विकल्प भी अधिक रखें मगर अधर्म के मार्ग से नहीं।

सत्यधर्म अपनी जगह होता है मगर खुद जीने के लिए कई बार मनुष्य को सत्य से अड़िग होना पड़ता है, क्योंकि परिस्थितिया होती है जीवन का आधार नीव। नीव से ऊपर उठने के लिए साफ सुथरा बनने के लिए हो सकता है मिट्टी भी लग जाय, मगर यदि नियत ठीक हो तो इस मिट्टी की परवाह किये बगैर आगे बढ़ें!!

दुख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्य पूर्वक सब सहो।
होगी सफलता क्यों नहीं कर्त्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।।
अधिकार खो कर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है;
न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है।
इस तत्व पर ही कौरवों से पाण्डवों का रण हुआ,
जो भव्य भारतवर्ष के कल्पान्त का कारण हुआ।।
आपको याद होगा महाभारत में जयद्रथ बध के लिए अस्त्र शस्त्र न उठाने का प्रण करनेवाले श्रीकृष्ण को भी सुरदर्शन चक्र उठाकर सूर्य को ढकना पड़ा था।
रामायण में बाली बध के लिए मर्यादापुरुषोत्तम  श्रीराम को छिपकर बाण चलाना पड़ा था। यही होती है परिस्थितिया और धर्म। और यही है जीवन। मगर गन्दगी को मिटाने के प्रयास और नियति का अंत नहीं होने दे! यही है जीवन का आधार और इसी सत्य से मिल सकता है हिन्दुस्तान!! ऐसे लोगों का साथ देना भी अधर्म है जो लोग सारे विकल्प अपने परिणामों पर उपयोग करते है। सारे विकल्पों को चुननेवाला अवश्य ही अधर्मी होता है ऐसे मनुष्य का बध करने में कोई दोष नहीं।

Monday, 20 June 2016

मनुष्य जन्म से अपराधी नहीं होता है।

मनुष्य जन्म से अपराधी नहीं होता है और न अपराधी बनने की किसी में चेष्टा होती है, अपराधी बनाती है परिस्थितिया। फिर तो ऐसा कहना कि मनुष्य परिस्थितियों का दास है कुछ गलत नहीं होगा, होगा यदि मनुष्य भी ऐसा करे तो पशु से वह उत्तम क्यों है?

हम सजा देने में माहिर है और हो भी क्यों नहीं अपने आप को सर्वोत्तम जो समझते है। मगर थोडा समय हो तो सोचें सजा देने से बेहतर यह नहीं होगा कि हम उन परिस्थितियों पर विचार करें सजा उसे क्यों नहीं जो मनुष्य को अपराधी बनाने के लिए उत्पन्न कर रहा है। परन्तु सभी प्रकार की परिस्थितियों पर मनुष्य का अधिकार नहीं तो सजा देगा कैसे? एक बात तो है मनुष्य का यही अन्धापन है जब हराने लगता है तो वहा से तुरंत भाग लेता है और इसीलिए आज हम भारतीय संविधान का गीता की उपाधि देते है मगर कुछ भी हो संविधान गीता नहीं तो गीता बनने का आधार तो है, इसलिए ऐसा कह देना कि इसे कूड़े में डाल दो यही हमारी भूल होगी।

एक हँसते खिलते बचपन को अपराधी बनाने की अनेकों परिस्थितियां हो सकती है, जैसे पिता नसे में लिप्त हो माँ औरों के घर काम कर किसी तरह रोटी कमा पाती हो, बेटे को पढ़ने के लिए स्कूल से अधिक महत्वपूर्ण घर चलाने के लिए रोजगार हो, या स्कूल में कुछ बच्चों के पास आधुनिक सुख सुविधाओं का ढ़ेर लगा हो और दूसरा बच्चा उन सुविधाओं को देख अपने को तुच्छ समझने की भूल करता हो, या बच्चे ने कभी किसी नेता, अभिनेता या पूँजीपति का जलवा देख लिया हो और अतिशीघ्र उस जलवे को प्राप्त करना चाहता हो, या कोई बच्चा हँसी मजाक में अपने साथियों को खुस करने के लिए या अपने को बलशाली दिखाने के लिए दूसरे बच्चे को परेशान करता हो, चिढ़ाता हो, या बच्चा बचपन से अनाथ हो उसे खुद का पेट भरने के लिए लोगों की मार डाट गालियां खानी पड़ती हो, आदि आदि परिस्थितियां हो सकती है। मगर कुछ भी हो अपराधी तो इन परिस्थितियों को पैदा करनेवाला ही है। चाहे वह मनुष्य हो या प्रकृति हो या शासन व्यवस्था सरकार। अदालतों में सजा मनुष्य को देते समय इन परिस्थितियों को भी सजा देना होगा तब संविधान गीता के समकक्ष होगा और समकक्ष क्यों यही तो है गीता।

एक संवृद्ध शक्तिशाली संविधान बनाने के लिए इन परिस्थितियों पर विजय पाने के लिए हमें व्यक्तित्व निर्माण करना होगा और व्यक्तित्व निर्माण बचपन निर्माण से होगा, इसलिए सबसे पहले स्कूलों की व्यवस्था में नवीनीकरण करना होगा। हमें परिवर्तन करना होगा हमने पिछले दिनों में बदलाव किया बदलाव का अर्थ होता है चेंज बुरा भी और अच्छा भी,मगर परिवर्तन का अर्थ होता है चेंज सिर्फ अच्छा ही। हमने जो चेंज किया गुरुकुल से हटकर स्कूलों में यही तो अपराध की जननी है परन्तु इस बदलाव के लिए हम जिम्मेदार नहीं क्योंकि उस समय परिस्थितियों ने हमें ऐसा करने पर मजबूर किया तभी तो हम आगे बढ़ने के बजाय पीछे चले गए गुरुकुल से स्कूल पर आ गए, और आज भी परिस्थितियां इतनी आसान नहीं जब आप नवीनीकरण की बात करेंगे तो कुछ अज्ञानी लालची लोभी असामाजिक लोग इसे भगवाकरण का नाम दे विरोध जताएंगे मगर उन्हें भी सोचना होगा परिवर्तन कोई भगवाकरण नहीं और यदि भगवाकरण से ही परिवर्तन संभव है तो इसमे बुरा क्या है? बिना ऐसा किये आपही बताएं बचपन निर्माण कैसे होगा? आप जिस संस्कृति को अपनाने की वकालत करते है वहा के स्कूलों में ढिशूम ढिशूम गोलियां चलती है, बारह पंद्रह साल की बच्चियां गर्भवती हो जाती है, क्या आप ऐसा व्यक्तित्व निर्माण चाहते है? इसी माहौल ने आज भारत के टुकड़े टुकड़े किये है और टुकड़े ना हो इसके लिए सुदृढ़ संविधान का शीघ्र निर्माण हो यही हमारी कामना है।

जिस तरह चेंज हुआ गुरुकुल से स्कूल का उसी तरह न्याय से हम भटक गए संविधान में, चले थे भगवान बनने बन गए पैग़म्बर। हमारी संस्कृति उस न्याय की है जो न्याय, वह न्याय, जहाँ पक्षपात न हो जहाँ न्यायाधीश न्याय करते समय अपने बेटे, बीबी, भाई, जाति,धर्म, पिता,गुरु आदि किसी का भी ध्यान न रखे, बस न्याय तो न्याय करे। मजे की बात यह है कि हम जानते है कि हमारा संविधान पक्षपात पूर्ण है, इस संविधान में जाति का जिक्र है, धर्म का जिक्र है, नेता का जिक्र है, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री आदि आदि का जिक्र है, जिसके नाम पर न्याय संग पक्षपात होता है, जब कोई नेता लाखों की सैलरी, अन्य सभी सुविधाएं फ्री, बिना टैक्स दिए, लेता है तो ईर्श्या होती है, मगर धर्म के नाम पर चार औरतों के साथ अन्याय करने में मजा आते समय सब कुछ भूल जाता है,सत्य तो पसंद है मगर सत्य का सामना करना कोई नहीं चाहता, शाहस करें! पक्षपात ऐसा मीठा जहर है जो जीने भी नहीं देता और मरने भी नहीं देता, फिर भी परिवर्तन नहीं चाहते, पता नहीं किस गुमान में भटके पड़े है, भाई अहंकार छोड़ो! इसी तरह का अहंकार कभी नोकिया मोबाइल कंपनी, अम्बेडकर फिएट कार कंपनी, पादरी धर्मवालों आदि लोगों को भी था, मगर क्या हुआ? नहीं परिवर्तन किया, नहीं किया इनोवेसन, नहीं किया नवीनीकरण, तो आज समय ने उन्हें संसार से बाहर कर दिया, यदि आप भी बाहर जाने को तैयार बैठे हो तो कोई बात नहीं वर्ना समय है, परिवर्तन के लिए कमर कसें और परिवर्तन का सहभागी बने!

Monday, 6 June 2016

जाट आंदोलन पर एक लेख।

जहाँ सुमति तह सम्पति नाना।
जहाँ कुमति तह बिपति निदाना।।
गोस्वामी तुलसीदास जी की ये पंक्तियाँ सभी को ज्ञात है परन्तु धैर्य उसी को है जिसने इसे अपने ऊपर ढाल लिया।

"करता हूं अनुरोध आज मैं , भारत की सरकार से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार से........."
"वर्ना रेल पटरियों पर जो , फैला आज तमाशा है ,"
"जाट आन्दोलन से फैली , चारो ओर निराशा है........."
"अगला कदम पंजाबी बैठेंगे , महाविकट हडताल पर ,"
"महाराष्ट में प्रबल मराठा , चढ़ जाएंगे भाल पर........."
"राजपूत भी मचल उठेंगे , भुजबल के हथियार से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार से........."
"निर्धन ब्राम्हण वंश एक , दिन परशुराम बन जाएगा ,"
"अपने ही घर के दीपक से , अपना घर जल जाएगा........"
"भडक उठा गृह युध्द अगर , भूकम्प भयानक आएगा ,"
"आरक्षण वादी नेताओं का , सर्वस्व मिटाके जायेगा........"
"अभी सम्भल जाओ मित्रों , इस स्वार्थ भरे व्यापार से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार से........"
"जातिवाद की नही , समस्या मात्र गरीबी वाद है ,"
"जो सवर्ण है पर गरीब है , उनका क्या अपराध है........."
"कुचले दबे लोग जिनके , घर मे न चूल्हा जलता है ,"
"भूखा बच्चा जिस कुटिया में , लोरी खाकर पलता है........"
"समय आ गया है उनका , उत्थान कीजिये प्यार से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार से........."
"जाति गरीबी की कोई भी , नही मित्रवर होती है ,"
"वह अधिकारी है जिसके घर , भूखी मुनिया सोती है........"
"भूखे माता-पिता , दवाई बिना तडपते रहते है ,"
"जातिवाद के कारण , कितने लोग वेदना सहते है........."
"उन्हे न वंचित करो मित्र , संरक्षण के अधिकार से ,"
"प्रतिभाओं को मत काटो , आरक्षण की तलवार से..........।।"

एक समय की बात है, एक लड़के को पोलिस ने चोरी के केस में पकड़ा। लड़के से पूछा कि तुम चोरी क्यों करते हो तो लड़के ने उत्तर दिया कि मेरे घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं होता है। पिताजी जितना कमाते है सब पैसे का शराब पी जाते है, माँ कही मेहनत मजदूरी कर जो भी कमाती है, पिताजी उसे भी झगड़ा झंझट कर उड़ा ले जाते है, माँ को कई बार भूखे सोना पड़ता है, जहाँ मजदूरीं करती है, वहा से कुछ खाने के लिए रोटी मिल जाती है, जिसे माँ खुद न खाकर हम लोगों में बाट देती है, अब बताओ साहेब मैं चोरी नहीं करूँ तो माँ का दर्द कैसे मिटेगा?

तभी पोलिस ने देखा कि कुछ प्रतिष्ठित लोग पत्रकारों के साथ उसी घर में पहुँचे। उन लोगों ने चोर लड़के के दूसरे भाई को बुलाया और उसे एक लाख रुपये का चेक देकर बोले, बेटा ये बताओ तुमने बोर्ड टॉप कैसे किया? तो दूसरा लड़का भी अपने घर की कहानी वही बताई और बोला बताइये सर ऐसी परिस्थितियों में यदि मैं पढ़ता नहीं तो क्या करता बिना पढ़े मेरे घर के हालात कैसे बदलेंगे?

बात परिस्थितियों पर नहीं, बात निर्भर करती है इंसानों की सोच पर, परिस्थितिया कुछ भी हो आप जो बनना चाहते है वह बन सकते है। अब तनिक सोचें कि उपरोक्त कविता सही है? फिर भी सही सही ही होता है। क्योंकि ये आरक्षण होता ही नहीं यदि गांधीजी का नेहरू प्रेम नहीं होता तो दलितों का कल्याणकारी कोई और योजना होती, जिससे किसी की प्रतिभा भी नहीं कटती और कोई भूखा या प्रताड़ित भी नहीं होता, मगर बिष जब पनफ गया है तो इतनी आसानी से मिटेगा नहीं, थोड़ा धैर्य रखें क्या पता आरक्षण की भूख खुद पे खुद मिट जाय।                           

Wednesday, 1 June 2016

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

एक लड़का एक लड़की से प्यार करता था, प्यार भी बेहद लड़की कुछ भी बोले लड़का करने को तैयार, कभी भी वह उसका अहित नहीं सोचता था वह उसे ईश्वर अल्लाह सबकुछ समझता था। मात्र इसलिए कि वह लड़के को अपनी मीठी मीठी बातों से पागल कर चुकि थी। लड़की के प्यार में लड़का अँधा हो चुका था। मगर लड़की दिल से नहीं दिमाग से प्यार करती थी उसे आभास था कि उसका भविष्य कितना सुरक्षित होगा इस बात का उसे एहसास था। एक दिन लड़की बोली तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो लड़का बोला जहाँ से चाँद तारे भी मांगो तो लाकर दूँगा। लड़की बोली चाँद तारे लेकर मैं क्या करुँगी? मुझे भय है कि तू अपनी माँ को बेहद प्यार करता है एक न एक दिन उसके कहने पर मुझसे जुदा हो जायेगा। लड़के ने लाखों सफाई दी लेकिन लड़की मानने को तैयार नहीं, फिर लड़का बोला तुम्ही बताओ मैं क्या करूँ? लड़की बोली अपनी माँ का दिल लाकर मुझे देदो तो मुझे विश्वास हो जायेगा कि तुम मुझे नहीं छोड़ोगे। लड़का बोला इसमें कौन सी बड़ी बात मैं अभी गया और अभी आया।

इतना कहकर लड़का माँ का दिल लेने चल दिया लड़के का अन्धापन ही कहिए कि लड़के ने माँ का दिल मार कर निकाल ही लिया। दिल लेकर बेतहासा लड़की की तरह दौड़ा रास्ते में ठोकर लगी और लड़का गिर गया। माँ के दिल से आवाज आई बेटा चोट तो नहीं लगी फिर भी प्यार में पागल दिल हाथ में लिए मग़रूर लड़की के पास पंहुचा तो लड़की लड़के के इस कारनामे से बहुत अधिक हतोत्साहित हुई उसे विश्वास ही नहीं था कि कोई इंसान ऐसा भी हो सकता है। उसने तुरंत कहा रे मुर्ख तू इतना खुदगर्ज है मैंने तो तुझे आज जाना। जो व्यक्ति अपनी माँ का नहीं हो सकता वह मेरा क्या होगा जा तू इस हत्या का प्रायश्चित्त कर तेरे लिए यही सजा है।

कहते है प्यार अँधा होता है, प्यार का अन्धापन वह मीठा जहर है जो खाने में तो अच्छा लगता है मगर अंत बुरा होता है। प्यार करना ही है तो उससे कर जिसके बाद कोई दुनियां बचती नहीं गिरा तब भी जीता बचा तब भी। जहा किसी की हार नहीं होती चुनना है तो ईश्वर चुन बेवफ़ा नहीं।

मेरी उजड़ी हुई दुनियां को तू आबाद न कर,
अपने बीते हुए लम्हें ऐ बेवफ़ा तू याद न कर,
कैद में आये घायल परिंदे की बस यही है तमन्ना,
ये भूल चुका है उड़ना तू इसे कभी आजाद न कर।
इन शेरों शायरियों से ऊपर उठें ये तो प्रतिरोधक है इस ज़माने के। इनके चक्कर में इतना खुदगर्ज न बने कि बाद में प्रायिश्चित करने का अवसर भी न मिले।

ज़िन्दगी के पाँच सच सदा याद रखें!

1- माँ के सिवा कोई वफादार नही हो सकता…!!!

2- गरीब का कोई दोस्त नही हो सकता…!!

3- आज भी लोग अच्छी सोच को नही,
अच्छी सूरत को तरजीह देते हैं…!!!

४- इज्जत सिर्फ पैसे की है, इंसान की नही…!!!

५- जिस शख्स को अपना खास समझो….
अधिकतर वही शख्स दुख दर्द देता है…!!!

गीता में लिखे के अनुसार कुछ ऐसा बोल सकते है।

अगर कोई इन्सान,बहुत हंसता है , तो अंदर से वो बहुत अकेला है।

अगर कोई इन्सान बहुत सोता है , तो वह अंदर से बहुत उदास है।

अगर कोई इन्सान खुद को बहुत मजबूत दिखाने की कोशिश करता है और रोता नही , तो वह अंदर से बहुत कमजोर है।

अगर कोई जरा जरा सी बात पर रो देता है, तो वो बहुत मासूम और नाजुक दिल का है।

अगर कोई हर बात पर नाराज़ हो जाता है, तो वह अंदर से बहुत अकेला और जिन्दगी में प्यार की कमी महसूस करता है।

लोगों को समझने की कोशिश कीजिये ,जिन्दगी किसी का इंतज़ार नही करती , लोगों को एहसास कराइए की वह आप के लिए कितने खास है।

1- कुछ पाने के लिए विकल्प बदले जाते है संकल्प नहीं।

2- जब सड़क पर बारात नाच रही होती हो तो हॉर्न मार-मार के परेशान ना हो...... गाडी से उतरकर थोड़ा नाच लें!  मन शान्त होगा। टाइम तो उतना लगना ही है..! कहने का मतलब दूसरों की खुशियों से परेशान न हो सो सके तो खुश होले वर्ना समय आपको बदल देगा।

3- रास्ते में अगर मंदिर देखो तो, प्रार्थना नहीं करो तो चलेगा . . पर रास्ते में एम्बुलेंस मिले तब प्रार्थना जरूर करना, शायद किसी की जिन्दगी बच जाये। क्योंकि मंदिर देख प्रार्थना आप अपने लिये करेंगे मगर एम्बुलेंस देख किसी गैर के लिये गैर पर किया उपकार ही धर्म है।

4-  जो संघर्षरत हैं, वह लाख बार हार के भी, नही हार सकता..!

5-  बादाम खाने से उतनी अक्ल नहीं आती...जितनी धोखा खाने से आती है.....!

6-  एक बहुत अच्छी बात जो जिन्दगी भर याद रखिये! आप का खुश रहना ही आप का बुरा चाहने वालों के लिए सबसे बड़ी सजा है....!

7- खुबसूरत लोग हमेशा अच्छे नहीं होते, अच्छे लोग हमेशा खूबसूरत नहीं होते...!

8- रिश्ते और रास्ते एक ही सिक्के के दो पहलु हैं... कभी रिश्ते निभाते निभाते रास्ते खो जाते हैं, और कभी रास्तो पर चलते चलते रिश्ते बन जाते हैं...!

9- बेहतरीन इंसान अपनी मीठी जुबान से ही जाना जाता है, वर्ना अच्छी बातें तो दीवारों पर भी लिखी होती है...!

सम्राट चंद्रगुप्त ने एक बार चाणक्य से कहा, चाणक्य, काश तुम खूबसूरत होते?

चाणक्य ने कहा, 'राजन, इंसान की पहचान उसके गुणों से होती है, रूप से नहीं।'

तब चंद्रगुप्त ने पूछा, 'क्या कोई ऐसा उदाहरण दे सकते हो जहां गुण के सामने रूप छोटा रह गया हो।'

तब चाणक्य ने राजा को दो गिलास पानी पीने को दिया।

फिर चाणक्य ने कहा, 'पहले गिलास का पानी सोने के घड़े का था और दूसरे गिलास का पानी मिट्टी के घड़े का, आपको कौन सा पानी अच्छा लगा।'

चंद्रगुप्त बोले, 'मटकी से भरे गिलास का।'

नजदीक ही सम्राट चंद्रगुप्त की पत्नी मौजूद थीं, वह इस उदाहरण से काफी प्रभावित हुई।

उन्होंने कहा, 'वो सोने का घड़ा किस काम का जो प्यास न बुझा सके।

मटकी भले ही कितनी कुरुप हो, लेकिन प्यास मटकी के पानी से ही बुझती है, यानी रूप नहीं गुण महान होता है।'

इसी तरह इंसान अपने रूप के कारण नहीं बल्कि उपने गुणों के कारण पूजा जाता है।

रूप तो आज है, कल नहीं लेकिन गुण जब तक जीवन है तब तक जिंदा रहते हैं, और मरने के बाद भी जीवंत रहते हैं।

पहले मैं होशियार था। इसलिए दुनिया बदलने चला था और आज मैं समझदार हो गया हूँ। इसलिए खुद को बदल रहा हूँ...।।

बात तो अच्छी है खुद को बदलना ही चाहिए! कहते है ज़माना ख़राब मगर आपको अच्छा बनने से किसने रोका है।

बुरा जो खोजन मैं चला बुरा न मिलिया कोय।
जौ दिल खोजों आपनों मुझसे बुरा न कोय।।

इन सभी बातों से भी बड़ी बात सब बातों का निष्कर्ष है कि-

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय ।

सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।

अर्थात- हे धनञ्जय अर्जुन कामना को त्याग कर सफलता और असफलता को एक समान मान कर तू अपने कर्म के प्रति एकाग्र रह। कर्म का कोई फल मिले या न मिले।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

अर्थात तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू फल की दृष्टि से कर्म मत कर और न ही ऐसा सोच की फल की आशा के बिना कर्म क्यों करूं।

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः ॥

जिसके सभी कर्म कामना रहित  हैं और जिसके सभी कर्म ज्ञान रूपी अग्नि से भस्म हो गए हैं, उनको बुद्धिमान लोग पंडित की उपाधि से विभूषित करते हैं।

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबंधनैः ।

सन्न्यासयोगमुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि।।

ऐसा करने से तू कर्मों के शुभ-अशुभ फल से मुक्त हो जायेगा। कर्मों के फल का त्याग कर तू संन्यासी योगी होकर मुझसे आ मिलेगा।

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।

ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्‌ ॥

अर्थात- मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूं, न कोई मेरा अप्रिय है, न प्रिय है, परंतु जो भक्त मुझको प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूं। कुछ मूर्ख लोग कहते हैं कि भगवान भी अपनी कृपा करने में भेदभाव  करते हैं – किसी पंर अपनी अधिक कृपा करते हैं और किसी पर कम। जबकि इस श्लोक में भगवान कहते हैं कि मैं सब भक्तों के प्रति समभाव रखता हूं।

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु: कौशलम-

अर्थात- निश्चित बुद्धि वाला व्यक्ति अच्छे और बुरे दोनों ही  प्रकार के फलों का भागी नहीं  होता| इसलिए तू कर्म करते समय अपनी बुद्धि को स्थिर रख। इसी कुशलता को योग कहते हैं।सामान्यतः व्यक्ति अच्छे कर्मों के पुण्य का भागी होना चाहता है, परन्तु  भगवान कहते हैं की जिस तरह बुरे कर्म के लिए पाप का भागी होना उचित नहीं है, उसी तरह से पुण्य फल की इच्छा रखना भी उचित नहीं है।

१.  निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु अवश्य होगी।प्रत्येक मनुष्य के जन्म और मृत्यु का समय निश्चित है और वह आज ही है।

२. ईश्वर ने सभी प्राणियों को कर्म करने का अधिकार दिया है, लेकिन उस कर्म के फल पर उनका कोई अधिकार नहीं है। प्रत्येक का भाग्य उस के कर्म से बंधा है अर्थात हर मनुष्य अपने भाग्य का रचयिता है।

३.प्रत्येक मनुष्य के लिए  परिस्थिति के अनुसार अपनी बुद्धि का प्रयोग करना आवश्यक है। सभी लोगों से अपेक्षित है की वे अपनी योग्यता, बुद्धि और पूर्ण ध्यान से अपना कर्त्तव्य समझ कर कर्म करें।

४. सभी से अपेक्षित है की वे अपने कर्म के प्रति निर्णय सोच विचार कर लें! निर्णय लेने के बाद उस पर कार्य रणभूमि के सैनिक की तरह से लें, यही कर्मयोग है।

अपने लिए नहीं अब यारोँ, देश की खातिर चलना होगा।।

वियोग छुपाकर हँसना होगा,
दर्द तुम्हे सब सहना होगा,
हार जीत की फ़िक्र किये बिन,
संघर्ष तुम्हे अब करना होगा।
भारत माँ को लूट रहे जन,
जंग हटा दो हथियारों से,
सूरज की परवाह किये बिन,
रोशन कर दो उजियारों से,
खुद की चिंता छोड़ हे प्यारे,
घनघोर घटा में चलना होगा।
बिना जले रोशन ना होगा,
भारत माँ का अंधियारा,
घोटालेबाजों के युग में,
जलना है कर्तव्य तुम्हारा,
दीपक बिना जले इस जग में,
कहा उजाला करता है,
दीपक के जलने पर यारों,
लाख पतिंगा मरता है।
जीवन का उद्देश्य समझ लो,
परोपकार का भेष पहन लो,
दर्द रोक ना पाऊं दिल में,
इसको आँखों में बहना होगा,
अपनी खातिर नहीं सही पर,
देश की खातिर जलना होगा।
सफ़र चलोगे लगेगा कांटा,
पर पहनके जूता फिक्र नहीं,
कठिन सफ़र है पग में छाले,
छालों को भी सहना होगा,
अपनों ने छालों को दिया है,
गिला न उससे करना होगा,
अपने खातिर सब जलते है,
हमें न खुद पर जलना होगा,
अपने लिए नहीं अब यारों,
सबकी खातिर गलना होगा।
घनी घोर अंधियार घटाएं,
डगर न सूझे पर पाव बढ़ाये,
लालच की अब इस बगिया में,
फूल पर हम क्यों दिल मंडराएं,
फूल उन्हें कर देंगे मुबारक,
लालच पे जिनकों मरना होगा,
दर्द में जीवन फूल में काँटों को,
अपना ख़ुसबु चुनना होगा,
अपने लिए नहीं अब यारोँ,
देश की खातिर चलना होगा।।