Thursday, 12 May 2016

जिसे 2002 गुजरात दंगो के विवाद में ना फंसा पाएं उसे डिग्री विवाद में घेरने वाले मुर्ख नहीं तो क्या?

आजादी के बाद से ही कांग्रेस या कांग्रेस विचारधारा के लोगों ने देश पर राज किया। 17 सालों तक नेहरू जी, 15 साल इंदिरा जी 5 साल राजीव जी 5 साल पी वी नरसिम्हाराव जी 10 साल तक श्रीमती सोनिया जी बाकि के लगभग 5 साल साल तक कांग्रेस की विचारधारा वाले चौधरी चरण सिंह, देवगौड़ा,गुजराल और चंद्रशेखर आदि। इतने लंबे समय से विपक्ष में नहीं रहने से इनमें सत्ता का सुख में अंधापन, ज्ञानहीनता, संवेदनहीनता और अनुभवहीनता स्पष्ट नजर आती है। अब जब जनता ने विपक्ष के लायक भी नहीं छोड़ा तो तिलमिलाहट होना स्वाभाविक है,मगर झुंझलाहट का अर्थ ये नहीं कि पप्पूगीरी चालू कर दी जाय विपक्ष अनुभवहीन है तो सीखना चाहिए अन्यथा सत्ता में वापसी क्या जनता में वापसी के लाले पड़ सकते है। कुछ विपक्ष के कारनामें गिनाता हूँ।

कांग्रेस के पुराने मझें हुए नेता बाबू दिग्विजय सिंह की भी मूर्खता विपक्ष के काम न आ सकी। कहते है इंसान अपने चाल चरित्र व्यवहार ज्ञान विज्ञान तर्क आदि के आधार पर ही बातें करता है बाबू दिग्विजय सिंह ने भी कुछ ऐसा ही किया। दिग्विजय सिंह चाची के प्यार में अंधे हो चुके थे उन्हें बहु बेटे नात समाज का कोई लोक लाज नहीं था। ऐसा व्यक्ति जब किसी लड़की के प्यार में फसता है तो सेक्स का भूत ही ऐसा होता है जिसके पास सात खूटे होते है, फंसते ही दो कान में, दो आँख में, दो नाक में ठूस देता है। फिर तो न दिखाई देगा न सुनाई देगा सब तो सब गन्दगी भी महसूस नहीं होगी सब में ख़ुसबु ही आएंगी। परन्तु जब सेक्स का भूत हटता है तो जाते जाते जो एक खूँटा बचा था वह कहा ठोकता है ये बताने की जरुरत नहीं लोग खुद ही समझदार है। उन दिनों कुछ ऐसे है हालात थे बाबू दिग्विजय सिंह के इसलिए इन्होंने मोदी जी की पत्नी का मुद्दा उठाया और हासिल क्या हुआ उल्टे इस मुद्दे से मोदी जी की सराहना ही हुई लोगों ने मोदी जी को त्यागी सन्यासी देश को पूरा जीवन समर्पित आदि समझने लगे। यहाँ भी विपक्ष को मुकी खानी पड़ी।

सोनिया जी के सपूत बचपन से ही बड़े लाड़ प्यार में पले बढ़े है, कभी दुःख देखना तो दूर दुःख किताबों में भी नहीं पढ़ा, जो कुछ भी चमचों ने दिखाया जैसे किसी कुटिया में खाना खिलाया, कही पर मिट्टी फिंकवाया, किसी का पैर छुववाया आदि। राहुल जी इसे ही गरीबी और देश की समस्या मान बैठे। एक तरफ अमीरी की पलँग दूसरी तरफ चमचों द्वारा दिखाई गई गरीबी की चादर, इसके सिवा जैसे देश में और कोई समस्या है ही नहीं, और भगवान ने शायद ज्ञान भी नहीं दिया कि परख सके कि ये गरीबी आखिर है क्यों? क्या वजह है कि आजादी के 70 सालों के बाद भी हर कोई आरक्षण की चाहत में जी रहा है। खैर इन सब अनुभवों के बीच राहुल जी का सवाल कि मोदी जी लाखों का सूट पहनते है स्वाभाविक है क्योंकि राहुल ने तो सूट देखें है, या फटी हुई चादर, बीच का सारा हिस्सा तो नदारत है, तो ज्ञान होगा कैसे? उन्हें ये भी ख्याल नहीं कि उनके पूर्वजो का सूट विदेशों से धुलकर आता था, कॉलेज में जितने गेट होते थे उतनी गाड़िया खड़ी होती थी, नेहरू जी को पिकअप करने के लिए। भूल गए कि प्रधानमंत्री की कुछ मर्यादाएं होती है, जिसे विदेशों में मुफ़्त लुटाया नहीं जा सकता। सवा सौ करोड़ का प्रतिनिधित्व करनेवाला जब साठ करोड़ के प्रतिनिधित्व करनेवाले से मिलेगा तो इस बात का ख्याल होना स्वाभाविक है, वर्ना भारत को भिखारी बनाने वालों का ख़्वाब तो पूरा होता नजर आएगा! जिसे मोदी जी ने होने नहीं दिया और देश के गौरव की खातिर एक साधारण से सन्यासी ने लाखों का सूट धारण किया, और भारत के स्वाभिमान को चार चाँद लगाया। यह भी कांग्रेस का दाव उल्टा पड़ा, पढ़े लिखे बुद्धजीवियों के बीच! और लोगों ने मान लिया बचवा अभी नादान है, भगवान ज्ञान दे!

राहुल तो नादान है बच्चा है लेकिन मणिशंकर अय्यर तो खेले खाये पुराने कांग्रेसी है इनमें तो थोड़ी बुद्धि होनी चाहिए! परन्तु क्या करेंगे कहा है विनाश काले विपरीत बुद्धि! कोई मुद्दा नहीं मिला तो बोले चाय बेचने वाले को प्रधानमंत्री नहीं बनने दूँगा। मोदी चाहे तो कांग्रेस के दफ़्तर के बाहर चाय बेच सकते है। ये वही मणिशंकर है। हाँ हाँ वही जो पाकिस्तान में जाकर बोले कि "मुझे पाकिस्तान सबसे प्रिय देश लगता है। मैं चाहता हूँ कि पाकिस्तान और भारत की मित्रता आगे बढ़े इसके लिए भारत हर कीमत चुकाने को तैयार है। कश्मीर तो एक छोटी समस्या है, ये तो पलक झपकते हल हो जाएंगी, बस मुझे सत्ता में आने के लिए आप लोग मुझे मदत दे!" अब यदि ऐसा व्यक्ति जो सत्ता के लिए पाकिस्तान से मदद मांग सकता है, उसकी औकात का अंदाजा आप तो लगा ही सकते है, कि समय आने पर वह क्या गुल खिलायेगा। खैर इतने गिरे लोग भारत में पैदा ही कैसे हो जाते है यह भी सोचने का विषय है, परन्तु इतने दिनों तक कांग्रेस के शासन ने ऐसे ही लोगों को प्राथमिकता दी गई, यह बात तो प्रमाणित होती है।

इन पुराने नेताओं के बीच नए नेता दिल्ली के सी एम केजरीवाल से लोगों ने बड़ी उम्मीदें बाँध रखी थी कि ये नया है कुछ न कुछ नया करेगा। वैसे तो पढ़े लिखे लोगों ने समझ लिया था कि ये बेवकूफ बना रहा है जनता को क्योंकि इसने जब अन्ना जी की बातें नहीं सुनी तो जनता की क्या खाक सुनेगा? फिर भी जनता तो जनता होती है लोगो ने जो निर्णय किया शायद वह समयोचित भी था अगर ये केजरीवाल जनता को धोखा नहीं देता तो। जो मुद्दे इसे उठाने चाहिए थे जैसे भ्रस्टाचार मुक्त भारत, स्वराज, आदर्श व्यवस्था, बेरोजगारी, अशिक्षा आदि वे मुद्दे सरकार उठा रही है या सरकार को समर्थन देने वाले लोग। ये तो कभी मोदी जी हर घंटे कुर्ता बदलते है, कभी इतना विदेश यात्रा क्यों करते है, कभी मोदी जी की डिग्री फर्जी है आदि आदि। लोगों ने सोचा था ये पढ़ा लिखा है,समझदार है, ईमानदार है अनशन करके इसने परिश्रम और जनून लगन का भी परिचय दिया है। तो भविष्य में अच्छा ही करेगा। मगर पप्पू तो पप्पू ये तो उसका पप्पा निकला। अब बात ये है कि इन चोचले बाजी वाली बातों से मनोरंजन तो हो सकता है, मगर लोगों के पेट नहीं भर सकते, देश को प्रगति नहीं मिल सकती, भारत कभी विष्व पटल पर अपना वर्चस्व कायम नहीं रख सकता। ऐसे में मोदी सरकार और समर्थकों का उत्तरदायित्व और भी बढ़ जाता है जब विपक्ष दिशाहीन अनुभवहीन विवेकहीन हो चूका हो।

दिशाहीनता के बीच कुछ शातिर लुटेरों ने समझ लिया है कि मोदी सरकार को सत्य मार्ग पर चलकर लताड़ा नहीं जा सकता। ईमानदारी पर चुनौती नहीं दिया जा सकता। परिश्रम लगन जनून तो जनता देख ही रही है। अब देश की किस नेता को पड़ी है सबको तो अपनी अपनी कुर्सी चाहिए! फिर एक ही रास्ता बचता है कि कुनबा जोड़ा जाय। इन दिनों खूब चर्चा है बिहार में मिली बीजेपी की हार का, लुटेरों के बीच आशा जगी है कि कुनबा जोड़ कर मोदी को सत्य मार्ग से बिचलित किया जा सकता है। इसीलिए पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट और कांग्रेस एक हुए और आने वाले दिनों में ऐसे प्रयोग और अधिक मिलेंगे मगर अब जनता को सोचना है कि कुनबा चाहिए या अपनी बंसजो का स्वाभिमान सम्मान और भविष्य आदि।

       जय हिन्द!

Wednesday, 11 May 2016

नितीश कुमार का बड़बोलापन और लंबी लंबी ख्वाइसों के बीच फंसा बिहार,

नितीश कुमार का बड़बोलापन और लंबी लंबी ख्वाइसों के बीच फंसा बिहार, जनता को तो कबीरदास जी के ये दोहे याद आ रहे है कि "करता रहा सो क्यों किया अब काहे पछताय। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाय।।" और जनाब है कि ख़्वाब पाल बैठे है संघ मुक्त भारत का। अब इनको कौन समझाए कि ऐसा ख़्वाब उस समय क्यों नहीं आया जब संघ की शरण में रहकर दस वर्षो तक बिहार की गद्दी संभाली और ख्याति लूटी, वैसे संघ का कार्य ही है व्यक्तित्व निर्माण करना शासन करना नहीं। संघ ने व्यक्तित्व बनाया अब कोई गद्दार निकल गया तो उसमें संघ का क्या दोष? युग तो ऐसा चल रहा है कि समय यदि ख़राब हो तो बाप की कहनी बेटा भी ठुकरा देता है और नितीश बाबू आप तो एक नेता मात्र ही है आपकी क्या औकात की सत्य मार्ग पर सदा बने रह पाएं।

संघ मिटाने का ख़्वाब बहुतों ने देखा 1923 में संघ का मज़ाक भी बनाया परन्तु मिट गए मिटाने वाले, सोचा नहीं देश हित लूटते रहे गरीबों की रोटियां, जब खुद खड़े हो गए मिटने की कगार पर तो अब ऐसा ही दर्द थोप दिया है नितीश जी आप के हवाले। नेहरू से लेकर राहुल तक ने कोशिश कर ली अब आप ने भी लँगोट संभाली ही है तो कोशिश में क्या जाता है।

आये दिन बिहार में बढ़ते अपराध चीख चीख कर बददुआएं दे रही है, मगर कुर्सी का अहंकार ही ऐसा होता है कि कान तक आवाज पहुचती ही नहीं। ऐसा ही भ्रम कभी बाली को भी हुआ था, जिसने अपने छोटे भाई की पत्नी को भी अपनी पत्नी की तरह रखा था, मात्र इस बहम में कि वह सर्वश्रेष्ठ योद्धा है। उसे कोई नहीं मार सकता, क्यों नहीं मानी ये बात सुग्रीव ने? सुग्रीव ने अपनी जान बचा गुफ़ा के दरवाज़े से वापस किसकिन्धा क्यों आ गया? यही गरूर लिए बाली ने अत्याचार किया। लेकिन परिणाम क्या हुआ जब श्री राम के मात्र एक बाण ने जमीदोज कर दिया तब नीतियां और धर्म याद आने लगा। वैसे तो सब भूल गया था नितीश बाबू बिल्कुल आप जैसा ही। याद है उसने क्या बोला। बोला कि "मैं बैरी सुग्रीव पियारा, अवगुन कौन नाथ मोहि मारा।" ऐसा सुनने पर लोगों के अनेकों तर्क सामने आने लगते है कोई बोलता है श्री राम ने छुप कर मारा यह उचित नहीं था तो कोई कहता है श्री राम ने अपने फायदे के लिए मारा। परन्तु श्री राम जी के उत्तर ने जब बाली को संतुष्ट किया तो हम आप न तो राजा है और न न्यायाधीश फिर भी तर्क कुतर्क ऐसा करते है जैसे असंतुष्ट बाली ने पहले किया था।

कभी कभार लोग ये भी बोलते है कि बाली एक पशु योनि का प्राणी था उसपर मनुष्य के नियम निति क्यों? मगर हम ये भूल जाते है कि निति और नियम की बात पहले बाली ने ही की थी, यदि कोई भी जीव निति या नियम की बात अपने स्वार्थ के लिए तो करता है परन्तु जब वही निति या नियम उसे जकड़ने लगते है तब पतली गली पकड़ भाग लेता है। सत्य अच्छा तो सबको लगता है मगर जब सत्य सामने परोसा जाता है तो किसी को भी अच्छा नहीं लगता। वैसे भी जीव बुद्धि से ही मनुष्य होता है। बाली बुद्धिमान नीतिवान और कुशल धर्मनिष्ठ प्राणी था कुछ अहंकार ही उसे धर्म से दूर कर गए वर्ना आज के मनुष्यों से श्रेष्ठ ही था। ऐसे बुद्धिमान जीव की योनि भले ही पशु हो परन्तु उसके सारे व्यवहार और निति मनुष्य जैसी ही होती है, और बुद्धिहीन मनुष्य की योनि भले ही मनुष्य की हो परन्तु वह पशु की भाँति होता है।

नितीश जी भी आजकल सत्ता मद में चूर जनता के दुःख दर्द से परे बस इनदिनों प्रधानमंत्री के ख्वाबो में डूबे हुए है जिन्हें नैतिकता से कोई लेना देना नहीं बस कुनबा जोड़ने में ज्यादा वक्त गुजार रहे है उन्हें बाली की वीरता और दुर्दशा का ज्ञान भी नहीं, बाली के कर्म कुछ अच्छे थे जो श्री राम ने अदृश्य होकर मारा परन्तु मरते वक्त दर्शन देकर धन्य कर दिया। जनम जनम मुनि जतन कराही, अंत राम कही आवत नाही। और बाली के सामने साक्षात प्रभु खड़े थे, लेकिन नितीश जी आप का क्या होगा? जिसे जनता का दर्द नहीं दिख रहा है। आप कम से कम उन्हें भी याद कर लीजिये जिन्हें जनता ने विपक्ष लायक भी नहीं छोड़ा एक समय उन्हें भी अहम् आपसे कम नहीं था।

सर उठाकर जहाँ देखो वही नजर आते है भोलेबाबा।।

हमें याद है स्वामी विवेकानंद और सुभास चंद्र बोस।
गर्व होता नहीं दलाल गद्दारों से और न आता है जोश।।
यह देश कभी भी नहीं गर्व करता मुल्लो या काजी से।
इस देश के लोगों में जोश आता है वीर  शिवाजी से।।
यह देश दिल से पूजता नहीं किसी अली या वली को।
बच्चा बच्चा अपने दिलोँ में रखता है बजरंग  बली को।
यह देश नहीं करता फकिरो या पीरो को कभी सलाम।
यह देश सीखता है जब शिक्षा देते है अब्दुल कलाम।।
पढते है उन्हें समझने के लिए हम बाईबल और  कुरान।
मगर अपने दिल में रखते है सर्वश्रेष्ठ गीता और पुराण।।
इस देश में कही भी नहीं टिकते है अल्लाह या काबा।
सर उठाकर जहाँ देखो वही नजर आते है भोलेबाबा।।

Monday, 9 May 2016

 उत्तर के लिए लिंक क्लिक करें! बहेलिया 1 रुपये में 40 चिड़िया, 3 रुपये में एक कबूतर और 5 रुपये में एक मुर्गा बेच रहा था एक आदमी 100 में 100 पक्षी लिया बताएं कौन सा पक्षी कितना कितना लिया उत्तर के लिए लिंक क्लिक करें!

एक बहेलिया 1 रुपये में 40 चिड़िया, 3 रुपये में एक कबूतर और 5 रुपये में एक मुर्गा बेच रहा था। एक आदमी 100 में 100 पक्षी लिया बताएं कौन सा पक्षी कितना कितना लिया

चिड़िया - 80, कबूतर - 1 और मुर्गा - 19 कुल 100 रुपये 100 पक्षी।

Saturday, 7 May 2016

जिन्हें जौहरी होना था अगर वो बनिया बन जाएँ तो परिणाम क्या होगा?

"एक  व्यक्ति  के  लिए  उसके  माता - पिता  और  शिक्षक  ही  उसके  जीवन  की  नीवं  तैयार  करते  हैं  और  यही  कारन  है  की  वह  जीवन  पर्यन्त  उनके  ऋण  से  उऋण  नहीं  हो  सकता ; हिंदुत्व  ने  इस  तथ्य  को  स्वीकार  किया  है  तभी  हिंदुत्व  में  उपनयन  संस्कार  द्वारा  जनेऊ  के  तीन  धागों  के  माध्यम  से  देव  ऋण , पितृ  ऋण  और  ऋषि  ऋण  को  धारण  करने  की  परंपरा  रही  है।

अतः  समाज  के  किसी  भी  नयी  पीढ़ी के निर्माण की दृष्टि से यह आवश्यक है कि माता  पिता के माध्यम से  सामाजिक परिवेश और शिक्षकों के द्वारा दी जाने वाली ज्ञान और शिक्षा की पद्दत्ति का उचित विकास हो; तभी यथार्थ में  एक बेहतर भविष्य का निर्माण सही अर्थों में संभव है।

परन्तु जब समझ ही विकृत हो और व्यवहारिकता व्यापार के  लाभ की मानसिकता से संक्रमित, रोगी हो तो स्वाभाविक है की कोई भी नयी पीढ़ी जो इन परिवेश में जन्म लेगी वह ऐसी ही बन जायेगी, ऐसे में, जब तक हम समस्या के प्रभाव में उलझे रहेंगे उसके मूल तत्व तक नहीं पहुँच पाएंगे। जिस वजह से समस्या का समाधान असम्भव होगा।

इतना तो सत्य ही है कि पक्के घड़े पर मिटटी नहीं चढ़ती पर इसका यह अर्थ नहीं की यथार्थ में हम उस आदर्श समाज का निर्माण नहीं कर सकते, बस, प्रयास को अपनी प्रक्रिया अपना तरीका बदलना पड़ेगा और फिर असम्भव कुछ भी नहीं होगा सब कुछ संभव होगा।

जिन्हें जौहरी होना था अगर वो बनिया बन जाएँ तो परिणाम क्या होगा? और ऐसे में, गलती किसकी ? व्यक्ति विशेष की या सामाजिक व्यवस्था की ? यही सोच आज वास्तव में हमारे समाज की समस्या है।

अभिभावकों के लिए आज   भविष्य की पीढ़ियां उनके पूँजी के  निवेश की वापसी का एक संसाधन मात्र है जिसके माध्यम से वो अपने और अपने परिवार की सुख, समृद्धि और सुरक्षा को सुनिश्चित करना चाहते हैं जबकि शिक्षा उद्योग  आज व्यवसायिक उपक्रम बन गया है जिसके लिए ज्ञान और सीख से अधिक लागत और लाभ का मह्त्व है, ऐसे में, अगर भविष्य की पीढ़ियां उसी कुंठित सोच के साथ बड़े हो तो गलती किसकी ?

व्यक्तिगत विशिष्टता की पहचान कर उसका उचित पोषण कर विकास  सुनिश्चित करना ही प्रत्येक अभिभावक का दायित्व है; शिक्षा के ज्ञान के द्वारा उन व्यक्तिगत विशिष्टताओं को सबल, आत्म निर्भर व प्रभावशाली बनाने की जिम्मेदारी शिक्षक की होती है पर दुर्भागयवश आज हमारे  समाज  की परिस्थिति ऐसी है  जहाँ लोगों को व्यक्तिगत विशिष्टताओं से मानो शिकायत सी हो गयी है, तभी सामंयकरन की प्रक्रिया द्वारा सभी को साधारण बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

जिस विशिष्ट को श्रिष्टि ने सामान्य बनाया था आश्चर्य नहीं की आज हमारे समाज ने उस विशिष्ट को ही अपवाद बना दिया है, ऐसे में, जब तक सामाजिक व्यवस्था के मूल भूत ढांचों में आवश्यक परिवर्तन  न किया जाए  हम  एक  बेहतर  भविष्य  का  निर्माण  कर  ही  नहीं  सकते ; किसी व्यक्ति विशेष अथवा सामाजिक संगठन द्वारा यह अकेले कर पाना संभव नहीं क्योंकि व्यवस्था के प्रावधान ने शक्ति का समर्थ शाशन तंत्र को सौंपा है और इस दृष्टि   से सामाजिक  नेतृत्व  की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण   है।

जब तक हम वर्तमान  की सहूलियतों  के लिए भविष्य की आवश्यकताओं  से समझौता  करते रहेंगे, ऐसे ही सामाजिक दुर्व्यवस्था  के शिकार होते रहेंगे।  अधिक कुछ नहीं तो कम से कम हम अपने प्रयास से यह तो सुनिश्चित कर ही सकते हैं कि समाज का नेतृत्व उचित हाथों में जाए! इतना अधिकार  तो संविधान  से हम सभी ने पाया है , अगर नहीं, तो सामाजिक विकास की दिशा और दशा से शिकायत करने का हमारा कोई अधिकार नहीं होगा, क्योंकि तब, दोषी और कोई नहीं बल्कि हम स्वयं होंगे!"

Friday, 6 May 2016

कैसे लालची अज्ञानियों ने समाज में ज़हर घोला है?

एक गांव में एक पंडित जी हर महीने पूजा पाठ कराने आते थे, गांव के लोग उन्हें बड़े ही आदर के साथ सम्मान देते थे और पंडित जी जो भी कथा बारता करते थे उसका अर्थ उन्ही गांव वालों की भाषा में बड़े प्यार से समझाते थे। उसी गांव के कालू जी कुछ दिनों के लिए बहार कमाने हेतु गए वहा उन्होंने रामचरित मानस की खूब बड़ाई लोगों द्वारा सुनी तो कालू जी के मन में इसकी जिज्ञासा बढ़ने लगी जब वे अपने गांव वापस आये तो,

एक दिन पंडित जी को निमंत्रण भेज कर बुलवाया और पंडित जी से रामचरित मानस समझाने की बात कही। अब सारे गांव वाले इकट्ठा हो गए मंच लगी पंडित जी ने कथा प्रारंभ से पहले पूछा भाई आप लोग कौन सा काण्ड सुनना चाहते है? लोग बोले पंडित जी हमें काण्ड आंड पता नहीं आप राम जी का विवाह काण्ड सुना दीजिये! अब पंडित जी केजरीवाल की तरह काफ़ी माहिर विद्वान थे। उन्होंने कथा प्रारंभ किया बोले श्री राम के विवाह में जनक जी एक शर्त रखी थी कि जो उस शर्त को पूरा करेगा मै उसी के साथ अपनी पुत्री सीता का विवाह करूँगा। अब यह शर्त सुनकर सभी देशों के नृप उस स्वम्बर में आये फिर आगे संत तुलसीदास जी कहते है कि सकल नृप मिलि एकही बारा। लगे उठावै टरे न टारा।।

अब भीड़ से आवाज आई वाह पंडित जी वाह क्या प्रसंग बोली है आपने, तब तक दूसरे ने बोला पंडित जी लगे हाथ इसका मतलब भी बोलते चलिये तो पंडित जी ने बताया कि वहा पर जुटे सारे राजा नृप सभी एक साथ मिलकर एक बारा (वड़ा) था उसे उठाने लगे लेकिन मज़ाल क्या वड़ा भी ऐसा वैसा नहीं था जो इन लोगों के बस की बात हो इतना जोर लगाया इतना कोशिश की लेकिन वड़ा टस से मस नहीं हुआ। अब भीड़ से एक ने पूछा पंडीजी जब वड़ा इतना बड़ा था तो ये बना कैसे इसे किस कड़ाही में पकाया गया?

पंडित जी ने बड़ी प्रसंसा की प्रस्न पूछने वाले की बोले देख़ो यही एक भक्त है जिसे खूब अच्छा ज्ञान है और कितना लगन पूर्वक आप सुन रहे है, आपको अवश्य ही इस कथा का लाभ होगा। रही बात वड़ा की तो तुलसीदास जी ने वर्णन किया है कि, जनम जनम मुनि जतन कराही। अंत राम कही आवत नाही।। जनम जनम से सारे ऋषि मुनि मिलकर लाख लाख जतन करके एक कड़ाही बनाया था और कड़ाही भी इतनी बड़ी की आखिर ने राम भी बोले यह कड़ाही हमसे भी नहीं आ रही है, तब लक्षमण जी ने चाप चढ़ाया और धरती को धमकाया कि हमारे बड़े भईया की इज्जत का सवाल है, कड़ाही से चिपको मत फिर क्या धरती ने भी मदद की और श्री राम ने कड़ाही उठाकर सीधा कर दिया। फिर एक बोला पंडीजी इसमे तेल कहा से आया और ये गर्म कैसे हुआ? पंडीजी बोले वाकहि में इस गांव के लोगों में भक्ति भाव और समझ अपार है भगवान भी अपलोगो को पूर्ण फल देगा। इतना कहकर पंडीजी ने कहा तुलसीदास जी कहते है कि वारिध तेल तप्त जनु वर्षा। एक दम गरमा गरम तेल की वर्षात हुई और वही तेल कड़ाही में भर लिया गया, फिर गरम करने की जरूरत ही नहीं उसी तेल में वड़ा पका लिया गया। अब वड़ा पकने के बाद जनक जी ने शर्त रखी कि जो भी व्यक्ति इस बड़ा को उठाकर तोड़ेगा उसी के साथ मैं अपनी पुत्री सीता का विवाह करूँगा।

भीड़ से पंडीजी के जयघोष खूब तेजी से होने लगे पंडीजी थोड़ी देर शांति के बाद जब जयघोष की आवाजें धीमी हुई तो बोले जब सारे नृप इस वड़ा को नहीं उठा पाये तो गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से श्री राम ने इसे उठाकर तुरन्त तोड़ दिया। और खास बात यह जब श्री राम जी कड़ाही उठा सकते है तो इस वड़ा की क्या औकात? बस इतनी सी शर्त पूरा होते ही श्री राम का विवाह सीता माता के साथ हो गया।

आज भी ऐसे पंडितों अज्ञानियों ने देश में निजी स्वार्थ बस अलुल जलूल शिक्षा का प्रचार प्रसार कर रहे है, जिनके द्वारा उत्पन्न चेले आगे चलकर सेक्युलर नेता बनते है और जैसे गुरु लूट रहे है वैसे ही चेले देश को लूट रहे है। कुछ गुरु थोडा बहुत दिमाग का दुरप्रयोग भी कर समाज में विष घोल रहे है उसका वर्णन निम्नलिखित है।

सनातन संस्कृति के शत्रुओं का अधूरा ज्ञान है जो संतों और ब्रह्मणों पर आक्षेप लगाता है,सुनकर कष्ट होता है। 'रामचरित मानस' के सुन्दरकांड में वर्णन है-"ढोल गंवार शूद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।" इस चौपाई पर लोग अपनी समझ बूझ और ज्ञान चरित्र विचार के आधार पर अर्थ बताते है। संत तुलसीदास के विषय में भी लोग बोलते है कि तुलसीदास जी की यह चौपाई अनुचित है। कोई स्त्री विरोधी बताकर तुलसीदास को अपशब्द बोलता है तो कोई शूद्र विरोधी बताकर अनर्गल प्रलाप करता है।

एक दिन मैने कहा, लाल शब्द के विषय में बोलें! तो भीड़ से आवाज आई खतरा, खून, रेड लाइट आदि आदि, थोड़ी देर बाद लगभग बीसों शब्द बता कर लोग चुप हो गए तो मैंने फिर पूछा और बताइए! तो धीरे धीरे एक ने बोला शुभ, दूसरे ने सावधान इसीतरह टमाटर देवीजी की चुनरी गुलाब का फूल आदि आदि। इस घटना से एक बात समझ में आई लोग सबसे पहले नकारात्मक बातों को बोलते है क्योंकि बचपन से ही ये मत करो ऐसा मत बोलो उससे खतरा हो सकता है ओ बुरा है। यहाँ तक जब कभी कोई ट्रेन बस आदि में सीट पर बैठने के लिए जब कोई जगह मागता है तो, तो हम मना कर देते है। परन्तु यदि वह बगल में बैठ जाता है तो थोड़ी देर बात यदि हम कुछ बैग से निकाल कर खाने लगते है तो उससे भी पूछते है। अब सोचने की बात है पहले तो जगह नहीं दे रहा था और थोड़ी देर बाद दोस्ती हो गई क्योंकि पहले हम सकारात्मक सोचने के आदती नहीं है।

बस यही कारण है कि अपने चरित्र के अनुसार लोग अर्थ का अनर्थ बता देते है।यदि संत तुलसीदास स्त्रियों से घृणा करते तो रामचरित मानस में उन्होंने स्त्री को देवी समान क्यों बताया? "एक नारिब्रतरत सब झारी। ते मन बचन क्रम पतिहितकारी॥“ अर्थात, पुरुषों के विशेषाधिकारों को न मानकर स्त्री-पुरुष को समान रूप से एक ही व्रत पालन करने का आदेश दिया गया है। तुलसीदास ने रामचरित मानस में सीताजी को परम् आदर्शवादी स्त्री यहां तक कि लंका से मंदोदरी और त्रिजटा का चित्रण भी सकारात्मक हीं किया है। सुरसा जैसी राक्षसी को भी हनुमानजी द्वारा माता कहना,कैकेई और मंथरा का भी अपनी गलती का अहसास होने पर पश्चाताप करने का वर्णन तुलसीदास ने किया है। अब तुलसीदास के शब्दों का अर्थ-'स्त्री को पीटना' कैसे हो सकता है?

इस प्रसंग का भी ध्यान रखना आवश्यक है कि तुलसीदास शूद्रों के विषय में ऐसा लिख हीं नहीं सकते क्योंकि उनके आराध्य श्रीराम द्वारा शबरी,निषादराज,केवट आदि से मिलने के वर्णन इतने आदर्श रूप में किया हैं। संत तुलसीदास ने ' रामचरित मानस की रचना' "अवधि" में की है। इसलिए प्रचलित क्षेत्रीय शब्द अधिक आए हैं। "ताड़ना" शब्द को संस्कृत से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। "ताड़ना" अवधि भाषा का एक शब्द है,जो मुख्यतः उत्तर प्रदेश और बिहार की क्षेत्रीयक्षेत्रीय भाषा है। ताड़ना का अर्थ होता है- 'पहचानना','परखना','रेकी करना' बहुत ही ध्यान पूर्वक समझने की कोशिश करना या विश्लेषण करना आदि। संत तुलसीदास कहते हैं कि-"हम ढोल के व्यवहार (सुर) को नहीं पहचानते तब उसे बजाते समय उसकी आवाज कर्कश होगी। इसलिए उसके स्वभाव को जानना आवश्यक है। इसी प्रकार गंवार का अर्थ अज्ञानी जनों से है,उनकी प्रकृति को समझे बिना उनके साथ जीवन सही से नहीं बिताया जा सकता। इसी प्रकार पशु और नारी के विषय में भी वहीं अर्थ है कि जब तक हम नारी के स्वभाव को नहीं पहचानते उसके साथ जीवन का निर्वाह अच्छी तरह और सुखपूर्वक नहीं हो सकता। और जब तक इनसे भलीभाँति परिचित या इनका व्यवहार नहीं जान लेते तब तक इनसे सावधान भी रहिए। इसका वास्तविक भावार्थ है-ढोल, गंवार, शूद्र, पशु तथा नारी के व्यवहार को ठीक से समझना चाहिए और उनकी किसी भी बात का बुरा नहीं मानना चाहिए।


ढोल एक बाद्य यंत्र है जिस प्रकार इसका ज्ञान भलीभाँति हुए बगैर, अच्छे सुर नहीं आ सकते उसी प्रकार जो जीव आदर्शता नैतिकता मर्यादा सामाजिक चेतना कीर्ति हानि से अचेत हो, इसे बचाने या बनाने के प्रयासों से अछूता हो, ऐसी कुटिलता शुद्र गवार पशु और नारियों में अधिक मिलती है इसलिए ये सब विवेक पूर्वक समझने जानने के अधिकारी है अन्यथा इनसे धोखा मिल सकता है।

इस तरह समाज में अज्ञानता अशिक्षा का प्रचार प्रसार आजादी के बाद से ही हो रहा है जिसके परिणामस्वरुप देश में अनैतिकता अपराध घोटाले घूसखोरी भ्रस्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है और जब गुरु ही लालची तो चेले भी लालची पैदा हो रहे जो समाज को बाटने और बिगाड़ने का काम कर रहे अतः मैं सभी बन्धुओ से निवेदन करूँगा का कि किसी भी संत या महापुरुष के विचार जाने बगैर अनाब सनाब का ज्ञान न बाटें जिससे समाज की श्रद्धा और नैतिकता बनी रहे।

   - जय श्री राम।

Thursday, 5 May 2016

श्री मनमोहन सिंह जी ने कहा था कि देश की सम्पदा पर पहला हक़ मुस्लिमों का है। झटका आपको लगेगा भी कैसे? मोदीजी कहते है कि सेक्युलरिज़्म पर बहस होनी चाहिए।

नरेन्द्र मोदी ने बार बार कहा है कि सेकुलरिस्म के मायने पर राष्ट्रीय बहस की आवश्यकता है। प्रवासी भारतीयों को दिए अपने उद्बोधन में उन्होंने अपने सेकुलरिस्ज्म की वह परिभाषा दोहराई भी जिसके अनुसार सेकुलरिज्म का अर्थ है - इंडिया फर्स्ट अर्थात भारत ही सर्वोपरि है। लेकिन बात फिर वही आ कर खड़ी हो गयी।

मोदी के ये कहते ही कांग्रेस ने कहा कि भारत के सर्वोपरि होने की बात करना सेकुलरिस्म नहीं है। अरे भाई आपके बयान में कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है, क्योंकि शेर भी कुछ कदम चलने के बाद पीछे मुड़ कर देख लेता है परन्तु भ्रमित सेक्युलर आजादी के इतने सालों के बाद भी पीछे मुड़ कर देखने को तैयार नहीं।

बात भी सही है। आखिर कांग्रेसी सेकुलरिस्म की परिभाषा तो भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कुछ साल पहले राष्ट्रीय विकास परिषद् की मीटिंग में घोषित रूप से दे चुके थे, जब उन्होंने कहा कि भारत के संसाधनों पर पहला अधिकार मुस्लिमों का है। झटका आप को लगेगा भी कैसे?

भले ही ये बात अल्लाह के फरमान जैसा लगे, या किसी तथाकथित सेक्युलर देश के प्रधानमंत्री का, फरमान हो,  लेकिन जब जनता के चुने दल का प्रधानमंत्री (और इस बयान के बाद जनता ने उसे दोबारा प्रधानमंत्री चुना) ऐसा कहे तो अर्थ तो यही है, कि भारत की जनता को यही सेकुलरिज्म चाहिए जिसमें देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुस्लिमों का हो।

आश्चर्य नहीं कि धर्म के आधार पर हुए बंटवारे में हिन्दुओं के लिए बचा-खुचा हिन्दुस्तान छोड़ने के 60 साल बाद सरकारी नौकरियों में और शिक्षा में मुसलमानों के लिए आरक्षण की बाद 80 प्रतिशत हिन्दू जनसँख्या वाले देश में चुनावी मुद्दा बनाने को तैयार है।

करदाताओं के खर्चे पर पलने वाली सच्चर समिति ने इसकी संस्तुति भी की। और इसी सेकुलरिस्म का अब विधिवत रूप से पालन पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य कर रहे हैं।

हिजाब पहन कर ईद की नमाज़ पढने वाली ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल में करदाताओं के पैसे से सरकार इमामों को तनख्वाह देती है तो उत्तर प्रदेश में तो सरकार ने घोषित ही कर दिया है की प्रदेश की बेटी मतलब केवल मुस्लिम बेटी। "हमारी बेटी हमारा कल" योजना केवल मुस्लिम बेटियों के लिए है।

इस बजट में सरकार ने इस योजना के लिए 350 करोड़ का आवंटन किया है। मुस्लिम लड़कियों को 10वीं पास करते ही 30000 रुपये की खैरात सरकार बांटेगी और हिन्दू लड़कियों को कुछ नहीं मिलेगा।

भले उत्तर प्रदेश के 40% बच्चे कुपोषण के शिकार हो और सरकार को उन्हें पेट भर खाना खिलाने के लिए पैसा न हो, लेकिन कब्रिस्तानों की मरम्मत के लिए 300 करोड़ रुपये दिए गए हैं। जिन इलाकों में मुस्लिम अधिक संख्या में हैं, सिर्फ उन इलाकों के विकास के लिए 492 करोड़ का विशेष फंड बनाया गया है। और अरबी भाषा के प्रचार प्रसार एवं मदरसों के लिए कुल 385 करोड़ की व्यवस्था की गयी है।

यही तो होता है "सेकुलरिज्म", और फिर जनता को भी तो ऐसा ही सेकुलरिस्म पसंद है तभी तो मनमोहन सिंह के 2006 के बयान के बाद 2009 में उन्हें और अधिक सीटों के साथ प्रधानमंत्री बनाया। और "सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए" कुछ भी कर गुजर जाने वाले मुलायम-पुत्र-अखिलेश को भी तो प्रचंड बहुमत से इसी जनता ने चुना। अखिलेश तो बस अब वही अपना सेक्युलर कर्त्तव्य निभा रहे हैं। तभी तो कुछ दिन पहले मारे गए पुलिस अधिकारी मरहूम जिया उल हक की बेवा परवीन की मांगें पूरा करने के लिए सरकार बिछी हुई है - वही लोग जिनके पास शहीद हेमराज के अंतिम संस्कार में जाने तक का समय नहीं था और जिन्होंने उसकी विधवा को अनशन पर बैठने को विवश किया था। आतंकवादी गतिविधियों के कारण पकडे गए मुस्लिम युवकों को छोड़ देने का वादा कर मुख्यमंत्री बने अखिलेश के कार्यकाल का पहला साल 6-7 छोटे-छोटे दंगे देख चुका है। बरेली में महीने भर से अधिक कर्फ्यू रहा था। पर सेकुलरिज्म की थोड़ी बहुत कीमत तो चुकानी पड़ती है न।

बेकार ही नरेन्द्र मोदी "इंडिया फर्स्ट" की रट लगा कर विकास विकास चिल्ला रहे हैं। अरे भाई - सेकुलर बनना हो तो मनमोहन सिंह या मुलायम सिंह की तरह बोलना, करना सीखिए! और वो न हो तो, भारत रत्न राजीव गाँधी को याद कर लीजिये - जिनका मेनका गाँधी के विरुद्ध चुनावी नारा था - "बेटी है सरदार की, क़ौम है गद्दार की"। देश को हिन्दू-मुस्लिम में बांटना, सिखों को गद्दार बोलना, हिन्दुओं को आतंकवादी बोलना और मुस्लिमों का चरण-चुम्बन करना जब तक आप नहीं करेंगें, जब तक आप "मेरे 6 करोड़ गुजराती" और "मेरा भारत सर्वोपरि" कहते रहेंगें, तब तक आप सेकुलर बन ही नहीं सकते। और 2009 के लोकसभा चुनाव और 2012 के उत्तर प्रदेश चुनाव 2015 का दिल्ली और बिहार चुनाव तो चार चाँद लगा रहा है सेक्युलरिज़्म पर फिर भी मोदी जी है कि समझ ही नहीं पा रहे है ये परिणाम तो चीख चीख कर कह रहे हैं कि जनता को सेकुलरिस्म कितना पसंद है। अनायास मोदी जी विकासवाद, इंडिया फर्स्ट का सपना देख रहे है जब जनता को जातिवाद और सेक्युलरिज़्म ही पसंद है तो वही अपनाए।

मोदीजी ने अपने जीवन में कभी भी नकारात्मक सोच को पनफने नहीं दिया उसी का परिणाम है कि एक छोटे से घर में जन्म पाने के बावजूद देश के प्रधानमंत्री बने, आज वही सोच है जो मोदीजी को अपने मार्ग पर चलने से विचलित नहीं कर सकती चाहे बिहार चुनाव हो या पश्चिम बंगाल। यदि इसी तरह की सोच प्रत्येक नहीं तीस पैंतीस प्रतिशत लोगो की भी हो जाय तो आने वाले पांच सालों में भारत नेतृत्व करेगा विश्व में।