Wednesday, 4 May 2016

भगवा सत्य है ईर्ष्या नहीं जीवन का ज्ञान है...। और हरा रंग बस नादान है, माया है।

भगवा सत्य है ईर्ष्या नहीं, जीवन का ज्ञान है...भगवा। अंतिम पड़ाव है, भगवान से मिलन का मार्ग है भगवा। ये कोई हिंदुत्व नहीं, जिसने समझा उसके लिए स्वाभिमान है, नहीं समझा तो अज्ञान है भगवा। क्यो अपनाए हम भगवा, किसके लिये अपनाए हम भगवा, इसी बहम को दूर करने का प्रतीक और प्रकृति का ज्ञान है भगवा।

जिस अज्ञान में हर पल गिरते है इंसान,
हर पल हर क्षण बनाने में जुटे है पहचान,
पर बनाने से बनता कुछ भी नहींयदि प्रकृति को पहचानने में भूल की तो! प्रकृति के करीब रहकर न्यूटन ने मात्र एक बार सेव गिरते देखा तो प्रख्यात हो गए और बन गई अपने आप ही पहचान। न्यूटन ने तो खोज कर ली गुरुत्वाकर्षण की आप कहा भ्रमित हो, ...इंसानो को हर पल गिरते देखकर भी इंसानियत नहीं खोज पाये, यही से मानव खो रहा है अपनी पहचान।

देखा होगा जीवन में आप ने भी आम का फल, सेव संतरा पपीता आदि अनेकों परन्तु क्या कभी सोचा कि ये जब अपरिपक्व इनमैच्योर होते है तब इनका रंग हरा होता है। लोग बोलते है अभी ये कच्चा है। ऐसा नहीं कि कच्चा फल उपयोगी नहीं, हरा रंग अछूत है, उपयोगी है, परन्तु जब तक हरा है, तब तक उसमें नहीं है ज्ञान। यदि आप हरे फल का सेवन करते है तो आपको रहना है अधिक सावधान। क्योंकि इससे आपको और आपके धर्म को हो सकता है नुकसान। हरे फल के सेवन की विधि सीखें और लोगों को भी सिखाएं! आम हरा है तो अधिक खट्टा है,परन्तु खाने की इच्छा है तो उसे आग में पका कर खाएं यदि कुछ आप ज्यादा ही उतावले है तो आपकी मर्जी चटनी बनाये या नमक लगाएं, आपतो चालक है इसलिए कहने का मतलब भी समझ रहे है।

धर्म में भी हरा रंग अपरिपक्वता की पहचान है। क्योंकि यह प्रकृति ही कहती है और अनुभव भी कुछ ऐसा ही है दुनिया को। अब हरे धर्म वालों के साथ रहना है तो कुछ तो सावधान रहना ही होगा। समय समय पर उनकी अज्ञानता को दूर करना होगा, उन्हें बताना होगा कि भगवा एक ऐसा रंग है जिसमें सारे रंग समाहित है हरा सफ़ेद पीला लाल सबका मिश्रण है भगवा, और हरा सिर्फ अकेला है, जिसमें सिर्फ एक ही रस है बाकि सब नीरस है। शुरुआत में अच्छा लगता है हरा रंग क्योंकि भौतिक सुखों की चाहत युवावस्था में अधिक होती है। परन्तु जब यही सुख भोगने की क्षमता नहीं होती है, तब अन्य रसों की आवश्यकता होती है। जिसके बगैर जीवन अधूरा होता है। इसलिए हिंदुओ ने अपनाया भगवा। चालाकी इसी में है कि हर कोई समझ ले भगवा और जीवन का सत्य स्वीकार ले भगवा अन्यथा भगवान, प्रकृति स्वंग कर देगी भगवा।

आपके भी मन में ख्याल आता होगा कि जब इतना सबकुछ ब्रह्माण्ड है भगवा, तो इस्लाम ईसाई जैन बौद्ध धर्म क्यों बन गए जब धरती पर पहले से ही मौजूद था भगवा। ख्याल अच्छा है हम भी और आप भी जानते है कि किताब खूब मोटी सी होती है पढ़ते है उसे सारे विद्यार्थी परन्तु हर कोई अपनी क्षमतानुसार अपनी आवश्यकतानुसार ही ग्रहण करता है जो जितना ग्रहण करता है अपने आने वाली पीढ़ी को उतना ही बताता है। रही बात अलग धर्म बनने की तो आज भी हर कोई अपनी अलग पहचान बनाने के लिए कुछ सोचकर कुछ नक़ल कर कुछ कापी पेस्ट कर कोशिश करता है। पहले भी ऐसा ही हुआ जिसमे जीतनी बुद्धिमत्ता थी उसने उतने अच्छे तरीके से कापी पेस्ट किया। परन्तु कापी पेस्ट भी इतना आसान नहीं होता है। कहते है नक़ल के लिए भी अकल की जरुरत होती है और जिसने इतना बड़ा नक़ल किया वह भी भगवान का ही अंश था। इतना सब कुछ अध्ययन किया इतना सबकुछ जाना भगवान के विषय में तो वह भगवान नहीं पर उनका ही अंश तो है।

मन यह भी सोचने को विवश होता है कि कैसे कैसे लोग है इस दुनिया में जो नक़ल को इतनी अहमियत देते है और सत्य जानने की कोशिश भी नहीं करते है.....! यही माया है! जिसे ईश्वर ने ही बनाया है। यदि सभी सत्य जान जायेगे तो संसार की सारी व्यवस्था डगमगा जायेगी और ऐसा ईश्वर भी नहीं चाहता, परन्तु आप तो सत्य को पहचानते है भगवान को जानते है, तो जिन्हें ईश्वर का ज्ञान नहीं सत्य की पहचान नहीं उसे क्यों नहीं समझाते? शायद इसका उत्तर यही कि यदि कोई समझना न चाहे तो उसे कोई भी शक्ति समझा नहीं सकती, और यह भी एक सत्य है। यदि आप समझते है और भगवान को मानते है तो ईर्ष्या नहीं करें! उनसे जो सत्य के अनजान है। जो इस दुनिया में नादान है। कच्चे हरे फल के समान है।

Tuesday, 3 May 2016

धर्म की बात करना जितना आसान है अड़िग रहना उतना ही कठिन।

प्रत्येक व्यक्ति के मन में परमार्थ होता है और उसका प्रत्येक कार्य भी उसी भाव से किया जाता है चाहे वह शुद्र हो या बैश्य क्षत्रिय, ब्राह्मण परन्तु सेवा भाव तब समाप्त हो जाता है जब स्वार्थ परमार्थ पर प्रभावी हो जाता है और यह कब होता है इस बात का अंदाजा कोई भी स्वार्थी नहीं लगा पाता अन्यथा लालच कभी मानवता पर शासन नहीं करता। जब भी सेवा करने वाले को धन की प्राथमिकता होती है यह तभी होता है।

आपने पढ़ा होगा भगवान गौतम बुद्ध को जिन्होंने राज्य त्याग दिया सेवा करने के लिए, राजा भरथरी, राजा हरीशचंद्र आदि ने भी त्याग किया था। वे जानते थे यदि सेवा करना है तो पहले त्याग सीखो! जो त्यागी नहीं है उसकी नियत कभी भी किसी भी समय बदल सकती है, इसमे कोई आश्चर्य वाली बात नहीं। ये तो बात काफी पुरानी है मैं कलयुग की, अभी जल्द ही की बात बताता हूँ। आजादी के समय भी लोगों ने त्याग किया परन्तु त्याग के परिणाम स्वरुप जो फल मिला उसे, संभालने की क्षमता का अभाव दिखा, वर्ना सिर्फ नेहरू परिवार के अतिरिक्त सभी का सम्मान और सभी धर्मो सभी वर्गों को उचित न्याय मिला होता। राज्य सभा में मोदी जी का ये बोलना कि " हमारे कार्यो को माइक्रोस्कोप लेकर खोजा जाता है और खोजने में कोई बुराई नहीं आप खोजें परन्तु आप ने यदि अपने कार्यकाल में बाइनोकूलर भी लेकर समस्याओं को खोजा होता तो मुझे इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती।" मोदी जी के ये वाक्य इस बात को प्रमाणित करता है।

हाल ही में अन्ना साहेब का अनशन और केजरीवाल की फ़ुफ़कार! ऐसा लगता था जैसे वाकहि में हम आजादी की दूसरी लड़ाई लड़ रहे हो! लग रहा था बस पल दो पल की बात है, अब पूरे हिन्दुस्तान में ईमानदार ही बचेंगे! भ्रस्टाचार को तो शरण नहीं मिलेगा! परन्तु हुआ कुछ विपरीत ही, क्योंकि परमार्थ के सामने स्वार्थ पर्वत हो गया, और होता भी क्यों नहीं क्योंकि जब सत्ता या संपत्ति की चाहत, चरमसीमा पर होती है तो त्याग और पर पीड़ा नहीं दिखता। इसीलिए आज केजरीवाल को मोदी के सिवा सब कुछ प्रिय लगने लगा है। अब न कोई भ्रस्टाचारी रहा और न कोई अत्याचारी, सारा अवगुन केजरीवाल के अनुसार मोदीजी में या जो मोदीजी की बात करे उनमे आ गया।

रही बात आरएसएस या देश के साधू संतो की तो संतो या आरएसएस के पास न कोई भाई है न भतीजा न परिवारवाद है न जातिवाद यदि कुछ है तो वह सिर्फ त्याग। जो व्यकि बचपन गुजार दिया देश का सेवा करने के लिए अगर आज उसके हाथ में सत्ता दे दी भी जाय तो कौन सा गुनाह या गलती होगी, यदि उसे लालच होता धन का तो बचपन से धनप्राप्ति का मार्ग चुनता आरएसएस की सेवा में अपना जीवन नहीं विताता। कुछ ऐसी ही कहानी है गोरखपुर के योगी आदित्य नाथ महाराज की जिन्होंने ने विज्ञान से स्नातक तो किया चाहते तो अपना जीवन यापन सांसारिक मोह माया में कर सकते थे परन्तु सब कुछ ऐसा नहीं होता जैसा दुनिया चाहती है वर्ना कहा श्री राम की राज्याभिषेक की तैयारी हो रही थी और अगले ही दिन बनवास हो गया।

योगीजी को भी सन्यास से कम कुछ स्वीकार नहीं था। उनका भी मन परमार्थ कार्यो के प्रति समर्थित था इसीलिए उन्होंने मात्र बाइस वर्ष की अवस्था में ही पूर्ण रूप से सन्यासी हो गए और तेज तर्राक स्पष्टवादिता की वजह से लोकप्रिय भी। अन्य नेताओ की तरह किसी धर्म या वर्ग का झूठा तारीफ या विरोध कर कभी वोट नहीं मांगा। जो सच रहा सिर्फ वही कहा। क्या जरुरी है कि किसी वर्ग को खुस करने के लिए किसी वर्ग को दबाया जाय! योगी जी ने दबानेवालों का विरोध किया। आपको याद होगा जब रावण की नगरी में श्री हनुमान जी का प्रवेश हुआ था तो रावण के पूछने पर कि, तुमने हमारे पुत्र को मारा है! इसलिए तुम दोषी हो तो हनुमान जी ने कहा था।

फल खायों लागौ अति भूखा,
कपि स्वभाव ते तोड़ेऊ रुखा।
जो मोहि मारा सो तेहि मारा,
तापर बाँधेसि तनय तुम्हारा।

जाहिर सी बात है जब रावण ने सीता माता का अपहरण किया था तो हनुमान जी का नगरी में प्रवेश स्वाभाविक था और कोई दुश्मन के घर जायेगा और भूख लगेगा तो वही कुछ न कुछ खायेगा ही, जब जो गलती करेगा तो उसका परिणाम भी मिलेगा। और योगीजी ने सदा ऐसा ही किया।

मेरे कहने का मुख्य मतलब यह कि स्पष्टवादिता अवगुन नहीं गुण है जो आज के सेक्युलर नेताओं के मन से गायब है जिसकी वजह से वे छल कपट स्वार्थ लालच से पुरे भरे पड़े है। तिनका सा भी मानवता का स्थान सेक्युलरों के दिल में नहीं बचा है, इसीलिए अब समय आ गया है कि हम सत्ता सन्यासियों को सौपे! जिसके पास न परिवार है और न कोई लालच....!
सबतो ठीक! परन्तु इस भ्रस्टाचारी लुटेरे युग से मुक्ति के लिये ऐसा सोचना कुछ गलत नहीं कि एक सन्यासी देश को लूटेगा क्यों? ठगी से बचने का यही एक समाधान है कि आगामी सभी चुनावों में योगी आदित्य नाथ जैसे सन्यासियों को प्राथमिकता दी जाय!!

आज एक नेता से मुलाकात हो गई, संबंध अच्छे थे इसीलिए बात हो गई।

आज एक नेता से मुलाकात हो गई,
संबंध अच्छे थे इसीलिए बात हो गई,
नेताजी गांधीजी की फ़ोटो लगाते थे,
शायद रोज रोज माला फूल चढ़ाते थे,
बोले आजकल भाग्य हमारा क्यों रूठा,
पहले हराभरा था अब तो हूँ पेड़ ठूठा,
अच्छे दिन कहा है आप मुझे बताओगे,
जब है ही नहीं तो कैसे मुझे दिखाओगे,
नेता जी जरा मजाकिया अंदाज में बोले,
मैंने कहा चमचगीरी छोड़ बुद्धि तो खोले,
दिन तो दिन होता है लाल और न पीला,
प्रशासनिक कड़ाई से यदि पैन्ट है गीला,
बस यही एहसास है जो मेरे लिए खास है,
हमतो भइया खुस है पर नेताजी उदास है।
लक्ष्य आदर्श व्यवस्था निर्भीक संविधान,
नहीं चाहिए सत्ता और न साजो सामान,
हमें भी किसी का विरोध नहीं करना है,
बड़े ही सादगी से लक्ष्य की ओर बढ़ना है,
गांधीजी के अनशन से यदि देश आजाद,
तो समर्थन से हमारा लक्ष्य कैसे बरबाद,
गांधीगीरी दिन रात वोट के लिए गाते हो,
स्वार्थ सिद्ध होते ही उपदेश भूल जाते हो,
मेरा समर्थन करने से खुद ही कतराते हो,
सरकार क्रियान्वयन करे ज्ञान ही बताते हो।।

Monday, 2 May 2016

आदमी की पहचान यदि वस्त्रो से यदि होती तो सफ़ेद कफ़न में लिपटा मुर्दा भी आपको नेतृत्व देता।

किसी का विरोध उसके विचारों से असहमती स्वाभाविक है करें ! परन्तु विरोध करने के लिए राष्ट्रद्रोह का मार्ग चुनना उचित न था और न है न होगा। स्वामी विवेकानंद जी के विचारों से प्रेरणा प्राप्त करें..!

-उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये.

- उठो मेरे शेरो, इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो, तुम एक अमर आत्मा हो, स्वच्छंद जीव हो, धन्य हो, सनातन हो, तुम तत्व नहीं हो, ना ही शरीर हो, तत्व तुम्हारा सेवक है तुम तत्व के सेवक नहीं हो।

-ब्रह्मांड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं। वो हम हैं जो अपनी आंखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अंधकार है!

-जिस तरह से विभिन्न स्त्रोतों से उत्पन्न धाराएं अपना जल समुद्र में मिला देती हैं, उसी प्रकार मनुष्य द्वारा चुना हर मार्ग, चाहे अच्छा हो या बुरा भगवान तक जाता है।

-किसी की निंदा ना करें। अगर आप मदद के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं, तो जरूर बढ़ाएं। अगर नहीं बढ़ा सकते, तो अपने हाथ जोड़िए, अपने भाइयों को आशीर्वाद दीजिए, और उन्हें उनके मार्ग पर जाने दीजिए।

-कभी मत सोचिए कि आत्मा के लिए कुछ असंभव है। ऐसा सोचना सबसे बड़ा विधर्म है। अगर कोई पाप है, तो वो यही है; ये कहना कि तुम निर्बल हो या अन्य निर्बल हैं।

-अगर धन दूसरों की भलाई करने में मदद करे, तो इसका कुछ मूल्य है, अन्यथा, ये सिर्फ बुराई का एक ढेर है, और इससे जितना जल्दी छुटकारा मिल जाये उतना बेहतर है।

-एक शब्द में, यह आदर्श है कि तुम परमात्मा हो।

-उस व्यक्ति ने अमरत्व प्राप्त कर लिया है, जो किसी सांसारिक वस्तु से व्याकुल नहीं होता।

- हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का ध्यान रखें कि आप क्या सोचते हैं। शब्द गौण हैं। विचार रहते हैं, वे दूर तक यात्रा करते हैं।

-जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।

-सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा।

- विश्व एक व्यायामशाला है, जहां हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।

- इस दुनिया में सभी भेद-भाव किसी स्तर के हैं, न कि प्रकार के, क्योंकि एकता ही सभी चीजों का रहस्य है।

-हम जितना ज्यादा बाहर जायें और दूसरों का भला करें, हमारा ह्रदय उतना ही शुद्ध होगा, और परमात्मा उसमे बसेंगे।

Sunday, 1 May 2016

परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है जिसे स्वीकारना होगा।

परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है जिसे स्वीकार करना ही होगा, परन्तु परिवर्तन आपके हित में हो, इसके लिए प्रयास करना होगा।

"काबुल" जो भगवान राम के पुत्र कुश का बनाया शहर था, आज वहाँ एक भी मंदिर नहीं बचा।

"गांधार" जिसका विवरण महाभारत में है, जहां की रानी गांधारी थी, आज उसका नाम कंधार हो चुका है, और वहाँ आज एक भी हिन्दू  नहीं बचा।

"कम्बोडिया" जहां राजा सूर्य देव बर्मन ने दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर "अंकोरवाट" बनाया, आज वहाँ भी हिन्दू नहीं है।

"बाली द्वीप" में 20 साल पहले तक 90% हिन्दू थे, आज सिर्फ 20% बचे हैं।

"कश्मीर घाटी" में सिर्फ 20 साल पहले 50% हिंदू थे, आज एक भी हिन्दू नहीं बचा।

"केरल" में 10 साल पहले तक 60% जनसंख्या हिन्दुओं की थी, आज सिर्फ 10% हिन्दू केरल में हैं।

"नोर्थ ईस्ट" जैसे सिक्किम, नागालैंड, आसाम आदि में हिन्दू हर रोज मारे या भगाए जाते हैं, या उनका धर्म परिवर्तन हो रहा है।

इतिहास देखें 1569 तक ईरान का नाम पारस या पर्शिया होता था और वहाँ एक भी मुस्लिम नहीं था, सिर्फ पारसी रहते थे। आज वहा कोई पारसी बचे है।

एक नाव मे बैठकर 21 पारसी किसी तरह गुजरात के नौसारी जिले के उद्वावाडा गांव मे पहुंचे, और आज पारसी सिर्फ भारत में ही गिनती की संख्या में बचे हैं।

ईसाईयों के 80 देश और मुस्लिमों के 56 देश हैं।

और हिन्दुओं का एक मात्र देश भारत ही अब हिन्दुओं के लिए सुरक्षित नहीं रहा।

ये भी परिवर्तन का एक हिस्सा है अब आपके हित में हो रहा है किसी और के या आपको इससे कुछ लेना देना नहीं है, जीने के लिए तो कोई भी धर्म अपना लो क्या फर्क पड़ता है ?

कुछ दिन पहले NDTV के रवीश कुमार ने RSS के सिन्हा सर से तल्ख़ मुद्रा में पूछा था कि अगर देश में मुस्लिम ज्यादा हो जायेंगें तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा ?
फर्क क्या होता है ये पढ़ें !

मुस्लिम बाहुल्य "काश्मीर विश्वविद्यालय" में एक फिल्म "हैदर" की शूटिंग चल रही थी, उसके एक दृश्य के फिल्मांकन के लिए तिरंगा झंडा लगाया गया, और कलाकारों को जय हिन्द बोलना पड़ा l

इतना बोलते ही विश्वविद्यालय के छात्र उस यूनिट पर टूट पड़े l

फिल्म का सेट तोड़ दिया गया, काफी जद्दोजहद के बाद फिल्म के कलाकारों को बाहर निकाला जा सका l

तिरंगे से उनकी नफरत और जय हिन्द पर आपत्ति इस सबका कारण थी l

पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया लेकिन कालेज प्रशासन के कहने पर छोड़ दिया गया l

ध्यान रहे वो अनपढ़ लोग नहीं, विश्वविद्यालय के छात्र थे l

अब सोचना पड़ेगा कि जब भारत देश का अस्तित्व ही नहीं होगा तब आप हिन्दू बनकर रहो या मुसलमान, रहोंगे तो बस गुलाम। और गुलाम नहीं बनना है तो हिन्दू ही बुरा क्यों ? इसलिए कि हिन्दू लालच की वजह से बंदेमातरम् और श्री राम का नाम सुनते ही सेक्युलरिज़्म का नारा देने लगता है, और जब तिरंगा जलाया जाता है हिंदुओ को मारा जाता है देशद्रोही नारे लगाये जाते है तब प्रवचन देता है कि मुट्ठी भर लोगों से भारत को क्या फर्क पड़ता है।

ये हमारे देश के सम्मान की बात है एक सुन्दर संवाद……
(एक बार ज़रूर पढ़ें )

बी एस सी के छात्र का कॉलेज का पहला दिन……
(गले में बड़े-बड़े रुद्राक्ष की माला)
प्रोफेसर-- बड़े पंडित दिखाई देते हो, लेकिन कॉलेज में पढ़ाई लिखाई पर ध्यान दो…… पूजा पाठ घर में ही ठीक है।
(क्लास के सभी बच्चे ठहाका लगाते हैं)
छात्र (विनम्रता से)-- सर, आप मेरे गुरु हैं, और सम्माननीय भी इसलिए आपकी आज्ञा से ही कुछ कहना चाहूँगा l

शिक्षक कहते हैं-- बोलो ?
छात्र-- सर, जब ऐसे छोटे कॉलेज छोड़िये आई आई टी और मेडिकल कॉलेज तक में मुस्लिम छात्र दाढ़ियाँ बढ़ाकर या टोपी चढ़ाकर जाते हैं और कितनी भी बड़ी लेक्चर हो क्लास छोड़कर नमाज़ के लिए बाहर निकल जाते हैं तो शिक्षकों को वो धर्मनिष्ठता लगती है।

मासूम बच्चे का जननांग काट कर मुस्लिम बनाया जाता है तो यह अंधविश्वास नहीं महान धर्म परायणता लगाती है।

जब क्रिश्चियन छात्र गले में बड़े बड़े क्रॉस लटकाकर घूमते हैं तो वो धर्मनिष्ठता हैं, और ये उनके मजहब की बात हुई।

और आज आपके सामने इसी क्लास में कितनी ही लड़कियों ने बुर्का पहना है, और कितने ही बच्चों ने जाली - टोपी चढ़ा रखी है तो आपने उन्हें कुछ नहीं कहा तो आखिर मेरी गलती क्या है ?

बस इतना कि मैं एक हिंदू हूँ।

जबाब बिहीन शिक्षक आखिर बोलता ही क्या..?

मित्रों हमें परिवर्तन चाहिये परन्तु राष्ट्र का नहीं, धर्म का नहीं, संस्कारों का नहीं। परिवर्तन चाहिए गरबी से अमीरी का, अज्ञान से ज्ञान का, अपमान से सुदृढ़ स्वाभिमान का, बेईमानी से सत्यनिष्ठा का, असुविधा से भौतिक सर्व सुख सुविधाओं का।

आइये 60 सालों के बाद आये हुए परिवर्तन का स्वागत करें ! यदि यह परिवर्तन हमारे हित में नहीं तो पुनः परिवर्तन करें ! परन्तु ठगों की चाल में फंसकर परिवर्तन का लाभः लेने से वंचित नहीं रहे ! हर प्रक्रिया का कुछ नियम है वह नियम पूरा होने तक धैर्य सहित अवसर प्रदान करें।

जय हिन्द…… जय भारत

नेतृत्व का अर्थ शासन करना या राज करना नहीं,नेता तो मार्गदर्शक होता है।

किसी का नक़ल कर सफ़ल नहीं होता कोई! श्री नरेंद्र मोदी जी का नक़ल कर या श्री मनमोहन जी का नक़ल कर कोई पी एम् नहीं बन सकता, न श्री चंद्रशेखर आजाद की नक़ल कर क्रांतिकारी और न गांधी जी का नक़ल कर कोई देश आजाद करा सकता है यदि अनशन करने से हुआ हो तो। परन्तु इन लोगों से प्रेरणा ली जा सकती है कि चाय बेचने वाला पी एम् बन सकता है। खाना पीना छोड़ अनशन करने से देश आज़ाद हो सकता है, आजाद की गतिविधियों से इतने बड़े देश का शासक डर सकता है।

भीड़ में चलने से सफ़र तो कट जाते है मगर मंजिल नहीं मिलती और भीड़ से जुदा होने से जिन्दगी नहीं मिलती अब बेचारा इंसान करे तो क्या करे। बड़ी अजीब सी जिन्दगी है साथ चले तो मंजिल छूटे, मंजिल मिले तो साथी। फिर तो बड़ी कठिन है डगर पनघट की। आखिर ऐसा क्यों उत्तर बड़ा सीधा सा है आओ बताते है!

एक समय की बात है एक छोटी सी बाजार के गांव में एक यादव जी रहते थे,वेचारे बड़े भोले भाले सन्त स्वभाव के थे मानो इस दुनिया की हवा ही नहीं लगी हो। एक दिन अपने दरवाजे पर बैठकर धूप ले रहे थे तभी बाजार के सेठ जी आ पहुँचे।यादवजी के पास एक गाय थी जिसे देखकर सेठ जी खरीदने की बात करने लगे काफी कुछ समझाने बुझाने के बाद गाय की कीमत 5 हजार सेठजी ने लगा दी अब यादवजी बेचने के लिए तैयार तो हो गए लेकिन बीबी का खौफ़ भी था, परन्तु शाहस जुटा यादव जी ने गाय 5 हजार में बेच ही दी।

अगले दिन यादवजी की बीबी मायके से वापस आ गई गाय दरवाजे पर न देख आते ही आग बबूला हो गयी, आव न देखी न ताव, बस यादव जी को भला बुरा बोलने लगी और बोली तुरन्त जाओ गाय वापस ले आओ। यादव जी बेचारे दबे मन सेठ जी के घर गए और सारी बातें बोले तो सेठ जी भी भले आदमी थे, गाय वापस करने के लिए तैयार हो गए, लेकिन बोले 6 हजार देने होंगे। अब मरता क्या न करता यादव जी 6 हजार दे कर गाय वापस ले आये।

अब थोड़ी देर बाद जब सेठ जी की बीबी घर से बाहर निकली तो गाय न देख सेठ जी से बोल बैठी, सेठ जी को समझाने लगी गाय बड़ी अच्छी थी, ऐसा करो जाओ अगर 7 हजार में भी दे तो वापस ले आओ। सेठ जी भी बात मान यादव जी के घर गए और यादव जी को 7 हजार देने की बात बोले तो यादव जी ने तुरंत हाँ कह दिया और 7 हजार लेकर गाय सेठ जी को बेच दी जैसे ही गाय का पगहा सेठ जी पकड़ दरवाजे से बाहर निकल ही रहे थे, कि यादव जी की बीबी फिर आ टपकी। अब सेठ जी जिद पर अड़ गए, बोले 8 हजार दो तब गाय वापस मिलेगी, यादव जी भी बेचारे 8 हजार देकर बीबी की गलियों से बचे और गाय वापस ले ही लिए।

अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि यादव जी को घाटा हुआ या फायदा वह भी कितने का?? ऐसे ही सवालों में उलझ गई है हमारी जिन्दगी, आखिर क्यों? शायद जब भी हमें फुर्सत मिलता है तो हम टीवी मोबाइल या चलचित्र घरों का रुख करते है और यही हमारी दिनचर्या हमें दर्शक बना दिया है हाँ हाँ मूक दर्शक हम चुप चाप अपने इर्द गिर्द समस्याओं को देखते है और सोचते है ये हमारे ऊपर कभी नहीं आएगी परन्तु यही वह भी सोचता था जो आज झेल रहा है। खैर इसका समाधान क्या है आओ बताते है!

शाम का समय था मैं अपनी गाड़ी से जौनपुर से जमलापुर को लौट ही रहा था की मड़ियाहूं के थोड़े से आगे जाम लगा हुआ था लगभग पचासों गाड़िया खड़ी थी उनमें बैठे सौ दो सौ लोग भी थे लोग उतर उतर खैनी गुटका खा खा बहस कर रहे थे और प्रशासन को भी कोस रहे थे, मैं आगे बढकर देखा तो एक यूकेलिप्टस का पेड़ आंधी की वजह से गिर कर रास्ता जाम किये हुए था। देखते ही मैंने कहा यार ये तो मैं एक हाथ से खीच कर हटा सकता हूँ ऐसे ऐसे कितनों पेड़ो को मैंने हटाया है,अब लोग मेरी तरफ अजीब सी निगाहों से देखने लगे कुछ तो मुझे भूत समझने लगे कुछ बहुबाती बड़बडी बेवकूफ। मैंने पेड़ की एक टहनी पकड़ी और कहा यार थोड़ी गाड़ी पीछे हटवाओ इस पेड़ को खीचने का जगह तो दो! अब तो लोग और भी सक करने लगे और कुछ हँसने भी लगे। परन्तु कुछ भले लोग भी थे जिन्होंने गाड़िया पीछे करवाई। जगह मिलते ही मैंने लोगों को समझाया बस आप लोग एक एक टहनी पकड़े और रास्ता अपने आप बन जायेगा। यकीन मानिए दो मिनट भी नहीं लगा और रास्ता साफ हो गया अब तो भारत माता की जय के नारे लगाने का ही वक्त है।

अब तनिक सोचें शक्ति भी थी समस्या भी थी फिर लोग परेशान क्यों थे? क्योंकि नेतृत्व नहीं था जिसके बगैर सहयोगी सहयोग नहीं कर रहे थे। मैं ये नहीं कहता आप सहयोगी बने, आप तो नेतृत्व कर सकते है यदि नहीं तो सहयोगी बने! अब गाय वाले का उत्तर कमेंट कर दे!
                  जय श्री राम!